Glacial Lake Flood Risk : नेपाल में आई भीषण बाढ़ के बाद अब हिमालयी क्षेत्रों की ग्लेशियल झीलों को लेकर चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिमाचल प्रदेश और तिब्बत क्षेत्र में मौजूद कई झीलें लगातार आकार में बढ़ रही हैं। यदि इनमें से किसी झील का प्राकृतिक बांध टूटता है तो इसका असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हिमाचल, पंजाब और जम्मू-कश्मीर के कई इलाके भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।
सतलुज बेसिन की हजारों झीलें चिंता का कारण
हिमकोस्टे के अध्ययन के मुताबिक सतलुज बेसिन में 2,292 ग्लेशियल झीलें चिन्हित की गई हैं। इनमें सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि 1,335 झीलें चीन अधिकृत तिब्बत में स्थित हैं। यानी आधे से ज्यादा झीलों पर भारत का सीधा नियंत्रण नहीं है। किसी भी बड़े बदलाव या खतरे की जानकारी केवल सैटेलाइट निगरानी के जरिए ही मिल सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इन झीलों का लगातार बढ़ता आकार भविष्य के खतरे का संकेत है।
गीपनगाथ और यारपाबंग बनीं बड़ी चिंता
लाहौल-स्पीति की गीपनगाथ झील पिछले कुछ दशकों में तेजी से फैली है। 1975 में इसका क्षेत्रफल करीब 27 हेक्टेयर था, जो अब 110 हेक्टेयर तक पहुंच चुका है। इसी तरह किन्नौर की यारपाबंग झील भी तेजी से बढ़ रही है। यदि भूकंप, भूस्खलन या हिमस्खलन जैसी किसी घटना से इन झीलों का प्राकृतिक बांध टूटता है तो भारी मात्रा में पानी और मलबा नीचे बसे इलाकों की ओर बढ़ सकता है। इससे नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ने का खतरा है।
तिब्बत में घटना हुई तो असर भारत में
सतलुज नदी का बड़ा हिस्सा तिब्बत से होकर आता है। ऐसे में अगर तिब्बत की किसी बड़ी ग्लेशियल झील में टूट-फूट या अचानक जल प्रवाह की स्थिति बनती है तो उसका पानी सीधे हिमाचल प्रदेश में प्रवेश कर सकता है। इसके बाद यही सैलाब पंजाब के मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ तिब्बत में मौजूद झीलों की निगरानी को बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
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पहले भी देख चुका है हिमाचल तबाही
यह खतरा केवल आशंका नहीं है, बल्कि इतिहास में इसके उदाहरण मौजूद हैं। वर्ष 2000 में सतलुज बेसिन में आई भीषण बाढ़ से 135 लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों किलोमीटर सड़कें व पुल बह गए थे। वहीं 2005 में तिब्बत की पारछू झील टूटने के बाद भी भारी नुकसान हुआ था। विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में ऐसे खतरे से बचने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम, सैटेलाइट निगरानी और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों पर नियंत्रण बेहद जरूरी होगा।