ईरान युद्ध का असर अब भारत के कृषि क्षेत्र तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। फारस की खाड़ी से खाद लेकर भारत आने वाले 17 जहाज होर्मुज स्ट्रेट में फंस गए हैं। इस वजह से देश में खाद आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। खास बात यह है कि अगले 15 दिनों में खरीफ सीजन के कारण खाद की मांग अपने चरम पर पहुंचने वाली है, ऐसे में देरी किसानों की मुश्किलें बढ़ा सकती है।
सरकार तैयार कर रही नया प्लान
स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार वैकल्पिक रास्तों पर काम कर रही है। योजना यह है कि फारस की खाड़ी के बंदरगाहों से खाद को पहले सड़क मार्ग के जरिए सऊदी अरब के यानबू बंदरगाह तक पहुंचाया जाए। इसके बाद वहां से जहाजों के जरिए भारत भेजा जाए। हालांकि यह रास्ता लंबा और महंगा है, लेकिन मौजूदा हालात में इसे सबसे व्यावहारिक विकल्प माना जा रहा है।
खरीफ सीजन पर असर का खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि जून के मध्य तक धान, मक्का और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई शुरू हो जाती है। इसी समय खाद की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। यदि आपूर्ति में 60 से 70 दिन की देरी होती है तो इसका असर केवल खरीफ ही नहीं, बल्कि आगे रबी सीजन की तैयारियों पर भी पड़ सकता है। इसलिए सरकार समय रहते समाधान खोजने की कोशिश कर रही है।
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खाद की कीमतों में भारी उछाल
युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। यूरिया की वैश्विक कीमत में 120 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं डीएपी, अमोनिया और सल्फर भी काफी महंगे हो चुके हैं। दूसरी तरफ डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने आयात लागत और बढ़ा दी है। इससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ने वाला है।
आयात पर निर्भर है भारत
भारत यूरिया, डीएपी और पोटाश जैसी कई प्रमुख खादों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। डीएपी की करीब 60 प्रतिशत जरूरत विदेशों से पूरी होती है, जबकि पोटाश लगभग पूरी तरह आयातित है। ऐसे में वैश्विक सप्लाई चेन में आई रुकावट का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ता है।
सब्सिडी बिल बढ़ने की आशंका
पिछले साल देश का खाद सब्सिडी बिल करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये था। मौजूदा हालात को देखते हुए इसके 3.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो सरकार को किसानों को राहत देने और आपूर्ति बनाए रखने के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ सकता है।