भारत में जल्द ही प्लास्टिक यानी पॉलीमर नोटों की शुरुआत हो सकती है। रिजर्व बैंक इस पुराने प्रस्ताव पर फिर से गंभीरता से विचार कर रहा है। हालिया बोर्ड बैठकों में इस विषय पर चर्चा होने के बाद यह मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया है। अगर यह योजना लागू होती है तो भारतीय करेंसी सिस्टम में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
क्यों उठी प्लास्टिक नोटों की जरूरत?
प्लास्टिक नोट लाने के पीछे सबसे बड़ा कारण उनकी लंबी उम्र मानी जा रही है। मौजूदा कागजी नोट जल्दी फट जाते हैं, गंदे हो जाते हैं और बड़ी संख्या में उन्हें हर साल नष्ट करना पड़ता है। वित्त वर्ष 2024-25 में करोड़ों खराब नोटों को चलन से बाहर करना पड़ा। इनमें सबसे ज्यादा 500 और 100 रुपये के नोट शामिल रहे।
छपाई का खर्च लगातार बढ़ा
नोट छापने पर RBI का खर्च भी तेजी से बढ़ रहा है। पिछले वित्त वर्ष में नोटों की छपाई पर 6372 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हुए, जबकि उससे पहले यह आंकड़ा करीब 5101 करोड़ रुपये था। यानी सिर्फ एक साल में खर्च में बड़ा इजाफा हुआ। माना जा रहा है कि पॉलीमर नोट लंबे समय तक चलने के कारण कुल लागत को कम कर सकते हैं।
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पहले भी हो चुकी थी कोशिश
यह पहला मौका नहीं है जब प्लास्टिक नोटों पर चर्चा हो रही है। साल 2012 में भी कुछ शहरों में पायलट प्रोजेक्ट की योजना बनाई गई थी, लेकिन तकनीकी कारणों से उसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका। अब तकनीक और संसाधनों में सुधार के बाद RBI दोबारा इस दिशा में कदम बढ़ाता नजर आ रहा है।
कैश की मांग अब भी बरकरार
डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ने के बावजूद देश में नकदी की मांग लगातार बनी हुई है। मई 2026 तक देश में 42.86 ट्रिलियन रुपये की करेंसी चलन में थी, जो पिछले साल के मुकाबले काफी अधिक है। यह दिखाता है कि लोग अब भी बड़ी मात्रा में नकद लेनदेन कर रहे हैं।
क्या कागजी नोट खत्म हो जाएंगे?
फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि कागजी नोट पूरी तरह बंद कर दिए जाएंगे। यदि पॉलीमर नोट आते भी हैं तो शुरुआत सीमित स्तर पर पायलट प्रोजेक्ट के रूप में हो सकती है। इसके बाद परिणामों के आधार पर आगे का फैसला लिया जाएगा। हालांकि इतना तय है कि RBI कम लागत, ज्यादा सुरक्षा और लंबी उम्र वाले नोटों के विकल्प तलाश रहा है, और प्लास्टिक नोट उसी दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकते हैं।