कुंभ नगरी प्रयागराज में माघ मेले के दौरान शुरू हुआ विवाद अब साधारण प्रशासनिक मामला नहीं रहा। मौनी अमावस्या के स्नान को लेकर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन आमने सामने आ गए। पालकी में बैठकर गंगा स्नान से रोके जाने की घटना ने संत समाज को गहराई से झकझोर दिया। समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का मुक्की हुई, जिसके बाद शंकराचार्य धरने पर बैठ गए। देखते ही देखते यह मुद्दा प्रयागराज से निकलकर लखनऊ और दिल्ली तक चर्चा का विषय बन गया।
नोटिस और चेतावनी से बढ़ा तनाव
विवाद उस समय और गहरा गया जब मेला प्रशासन की ओर से शंकराचार्य को एक के बाद एक नोटिस थमा दिए गए। प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में पद से जुड़ा मामला लंबित होने का हवाला दिया और मेला क्षेत्र से बाहर करने तक की चेतावनी दी। संत समाज ने इसे सीधे तौर पर अपमान बताया। इसी बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कालनेमि प्रवृत्ति वाला बयान सामने आया। बिना नाम लिए दिए गए इस बयान ने मामले को और संवेदनशील बना दिया और संतों के एक वर्ग ने इसे शंकराचार्य से जोड़कर देखा।
योगी और शंकराचार्य के बीच वैचारिक टकराव
मुख्यमंत्री के बयान के बाद संत समाज के एक बड़े हिस्से ने इसे शंकराचार्य पर हमला माना। यहीं से योगी सरकार और शंकराचार्य के बीच वैचारिक टकराव की चर्चा तेज हो गई। कई संतों का कहना है कि यह मामला केवल स्नान का नहीं बल्कि सम्मान और सनातन परंपरा से जुड़ा है। धार्मिक मंचों से प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठने लगे और पूरे प्रदेश में इस घटना को लेकर बहस शुरू हो गई।
डिप्टी मुख्यमंत्री के बयान से बदला माहौल
इसी बीच उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का बयान सामने आया, जिसने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया। उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को पूज्य शंकराचार्य कहकर संबोधित किया और सम्मानपूर्वक स्नान करने का अनुरोध किया। साथ ही उन्होंने कहा कि संतों के अपमान की जांच होगी और दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी। इस बयान को सरकार के भीतर अलग सुर के रूप में देखा गया, जिससे यह चर्चा भी शुरू हो गई कि सरकार के रुख में मतभेद हैं।
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संत समाज दो हिस्सों में बंटा
इस विवाद के बाद संत समाज दो हिस्सों में बंटता नजर आया। वृंदावन, हरिद्वार और नागपुर तक विरोध प्रदर्शन हुए। कई महामंडलेश्वरों ने इसे शिव की गद्दी का अपमान बताया और कार्रवाई की मांग की। हरिद्वार में धरना दिया गया और चेतावनी भी दी गई। योग गुरु बाबा रामदेव ने संयम रखने की अपील की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि किसी भी साधु का अपमान स्वीकार नहीं किया जा सकता।
राजनीति में भी तेज हुई बयानबाजी
राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे ने नई जान फूंक दी। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि शंकराचार्य का अपमान हर सनातनी का अपमान है। उन्होंने सरकार पर सनातन परंपरा को कमजोर करने का आरोप लगाया। शिवपाल यादव ने भी कालनेमि बयान पर पलटवार किया। विपक्ष ने इस पूरे विवाद को सरकार की कार्यशैली से जोड़ते हुए आने वाले चुनावों से भी जोड़कर देखना शुरू कर दिया। अब बड़ा सवाल यही है कि यह टकराव सम्मानजनक समाधान तक पहुंचेगा या आने वाले दिनों में और गहराएगा।