Siwan became a mafia land: बिहार का सीवान जिला पिछले चार दशकों में अपराध और राजनीति के गठजोड़ की वजह से बदनाम रहा है। 1980 के दशक से शुरू हुआ संगठित अपराध धीरे-धीरे इतना मजबूत हो गया कि जिले की पहचान ही बदल गई। हत्या, अपहरण, रंगदारी और गैंगवार जैसी घटनाओं ने आम लोगों के जीवन को प्रभावित किया। अलग-अलग समय में कई बाहुबली अपराधियों ने यहां अपना दबदबा कायम किया, जिससे सीवान को ‘माफिया लैंड’ कहा जाने लगा।
80 के दशक में अपराध की नींव
सीवान में संगठित अपराध की शुरुआत 1980 के दशक में हुई, जब छोटे-छोटे गिरोह सक्रिय थे। शुरुआत में ये गिरोह मामूली झगड़ों और लूट तक सीमित थे, लेकिन धीरे-धीरे इन्होंने राजनीतिक संरक्षण हासिल कर लिया। यही वह दौर था, जब अपराध और सत्ता के बीच संबंध बनने लगे। इस गठजोड़ ने अपराधियों को ताकत दी और वे बड़े नेटवर्क खड़े करने में सफल हुए।
शहाबुद्दीन का दौर और दबदबा
सीवान के अपराध जगत में सबसे चर्चित नाम मोहम्मद शहाबुद्दीन का रहा। उसने न सिर्फ अपराध की दुनिया में अपनी पकड़ बनाई, बल्कि राजनीति में भी मजबूत दखल कायम किया। विधायक और सांसद बनने के बाद उसका प्रभाव और बढ़ गया। उसके खिलाफ कई गंभीर मामले दर्ज हुए, लेकिन राजनीतिक संरक्षण के कारण उसका दबदबा लंबे समय तक कायम रहा। इस दौरान सीवान में डर का माहौल बन गया और लोग खुलकर बोलने से कतराने लगे।
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खान ब्रदर्स और अन्य बाहुबलियों का उदय
शहाबुद्दीन के बाद सीवान में नए बाहुबलियों का दौर शुरू हुआ। खान ब्रदर्स—अयूब खान और रईस खान—ने अपने प्रभाव से इलाके में पकड़ बनाई। इन पर हत्या, अपहरण और रंगदारी जैसे कई आरोप लगे। इनके अलावा मनोज पप्पू और बाबर मियां जैसे नाम भी अपराध जगत में सक्रिय रहे। आपसी दुश्मनी और गैंगवार ने जिले में हिंसा को और बढ़ाया, जिससे हालात लंबे समय तक तनावपूर्ण बने रहे।
नए गिरोह, पुलिस कार्रवाई और वजहें
समय के साथ चंदन सिंह जैसे नए अपराधी भी सामने आए, जिन्होंने पुराने गिरोहों की जगह लेनी शुरू की। हालांकि हाल के वर्षों में पुलिस और प्रशासन ने कई बड़े अभियान चलाकर अपराध पर नियंत्रण की कोशिश की है। कई अपराधी गिरफ्तार हुए या जेल में बंद हैं। इसके बावजूद सीवान का ‘माफिया लैंड’ वाला टैग पूरी तरह मिट नहीं पाया है। कमजोर कानून व्यवस्था, राजनीतिक संरक्षण, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता को इसके पीछे मुख्य कारण माना जाता है।