भारत के कृषि उत्पादों की वैश्विक पहचान बढ़ाने की कोशिशों को हाल के दिनों में बड़ा झटका लगा है। एक तरफ चीन ने भारतीय मिर्च की खेप को कीटनाशक अवशेष अधिक मिलने के कारण रोक दिया, वहीं जापान ने फ्यूमिगेशन प्रक्रिया में खामियां मिलने के बाद भारतीय आमों के आयात पर रोक लगा दी। इन घटनाओं ने भारत के कृषि निर्यात की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
कीटनाशकों के अवशेष बने बड़ी परेशानी
चीन ने भारतीय मिर्च में मेथामिडोफॉस नामक कीटनाशक की मात्रा तय सीमा से अधिक मिलने की बात कही है। इससे पहले चीन भारतीय गैर-बासमती चावल की कई खेप भी रोक चुका है। दूसरी ओर, भारतीय मसालों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंताएं सामने आई हैं। हांगकांग और सिंगापुर समेत कई देशों ने भारतीय मसाला उत्पादों में एथिलीन ऑक्साइड मिलने के बाद जांच और प्रतिबंध जैसे कदम उठाए थे।
निर्यातकों ने मांगी सख्त निगरानी व्यवस्था
आंध्र प्रदेश के मिर्च निर्यातकों और आम उत्पादकों ने सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि खेत स्तर से लेकर निर्यात तक गुणवत्ता जांच को मजबूत करने, किसानों को सुरक्षित खेती के तरीकों की जानकारी देने और खतरनाक रसायनों के इस्तेमाल पर नियंत्रण की जरूरत है। मसाला उद्योग से जुड़े संगठनों के अनुसार, विदेशी बाजारों में भारतीय उत्पादों की अस्वीकृति दर भी बढ़ी है।
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जांच सुविधाओं और नियमों की कमी चुनौती
भारत में खाद्य सुरक्षा से जुड़े नियम मौजूद हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार आधुनिक जांच सुविधाओं की संख्या अभी सीमित है। मसालों और कृषि उत्पादों में अत्यंत कम मात्रा में मौजूद रासायनिक अवशेषों की पहचान के लिए उन्नत तकनीक और विशेष प्रयोगशालाओं की जरूरत होती है। कई सरकारी लैब में अभी पर्याप्त उपकरणों की कमी बताई जाती है, जिससे जांच प्रक्रिया प्रभावित होती है।
वैश्विक बाजार में भरोसा बढ़ाना जरूरी
भारत का कृषि निर्यात लगातार बढ़ रहा है और 2024-25 में यह 51 अरब डॉलर से अधिक तक पहुंच चुका है। इसके बावजूद वैश्विक कृषि व्यापार में भारत की हिस्सेदारी अभी 3 प्रतिशत से कम है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार गुणवत्ता नियंत्रण, बेहतर टेस्टिंग व्यवस्था और मजबूत सप्लाई चेन ही भारतीय कृषि उत्पादों की विश्वसनीयता बढ़ाने और नए बाजारों में विस्तार की कुंजी साबित होगी।