अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दिखाई देने लगा है। एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी की रिपोर्ट के अनुसार, फारस की खाड़ी से तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के निर्यात में भारी गिरावट आई है। सुरक्षा जोखिम बढ़ने के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ गई है।
भारत ने बदली आयात रणनीति
ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारत ने कच्चे तेल और एलएनजी के आयात के लिए वैकल्पिक मार्ग अपनाने शुरू कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अब संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और ओमान के रास्ते ऊर्जा आपूर्ति बढ़ाई जा रही है, ताकि होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम की जा सके और आपूर्ति बाधित न हो।
ईरान की चेतावनी से बढ़ा जोखिम
ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि उसके तेल निर्यात को रोका गया तो वह फुजैराह पाइपलाइन और सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन जैसे वैकल्पिक मार्गों को भी निशाना बना सकता है। इस बयान के बाद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं और बढ़ गई हैं, क्योंकि इन मार्गों का इस्तेमाल कई देश करते हैं।
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एलएनजी जहाजों की आवाजाही घटी
एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी के आंकड़ों के अनुसार, जून के अंत में जहां रोजाना औसतन 0.8 एलएनजी जहाज इस मार्ग से गुजर रहे थे, वहीं 15 जुलाई तक यह संख्या घटकर 0.2 जहाज प्रतिदिन रह गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के दिनों में फारस की खाड़ी से बहुत कम एलएनजी जहाज बाहर निकल पाए हैं, जिससे बड़ी मात्रा में गैस खाड़ी के भीतर ही फंसी हुई है।
खाड़ी में जमा हुआ बड़ा स्टॉक
रिपोर्ट के अनुसार, कतर और यूएई में एलएनजी का उत्पादन सामान्य रूप से जारी है, लेकिन जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से लाखों मीट्रिक टन एलएनजी खाड़ी के भीतर ही अटकी हुई है। अनुमान है कि जुलाई के मध्य तक लगभग 19 लाख मीट्रिक टन क्षमता वाले एलएनजी टैंकर फारस की खाड़ी में खड़े थे, जो सामान्य दिनों के कई दिनों के निर्यात के बराबर है।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से पूरा करता है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट लंबे समय तक जारी रहता है, तो वैकल्पिक मार्गों से आयात करने के कारण परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि हालात सामान्य होने पर खाड़ी में फंसा एलएनजी स्टॉक तेजी से वैश्विक बाजार में पहुंचेगा, जिससे भारत समेत कई देशों को राहत मिल सकती है।