आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में क्रिटिकल मिनरल्स की अहमियत लगातार बढ़ रही है। इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर, सोलर पैनल, रक्षा उपकरण, टेलीकॉम, एयरोस्पेस और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कई क्षेत्रों में इन खनिजों की जरूरत होती है। इसी कारण दुनिया के बड़े देश अब इनके सुरक्षित और भरोसेमंद स्रोत तलाशने में जुटे हैं। भारत भी इसी दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है ताकि भविष्य की जरूरतों को समय रहते पूरा किया जा सके।
चीन का दबदबा क्यों है?
क्रिटिकल मिनरल्स के उत्पादन और खासकर उनकी रिफाइनिंग में चीन की मजबूत पकड़ मानी जाती है। कई देशों में लिथियम, निकेल और कोबाल्ट जैसे खनिज निकलते हैं, लेकिन उनकी प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग का बड़ा हिस्सा चीन में होता है। यही वजह है कि वैश्विक सप्लाई चेन में चीन की भूमिका काफी मजबूत रही है। हाल के वर्षों में वैश्विक तनाव और व्यापारिक विवादों के बाद कई देशों ने इस निर्भरता को कम करने की रणनीति अपनानी शुरू कर दी है।
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भारत ने तैयार किया नया नेटवर्क
रिपोर्ट्स के अनुसार भारत ने पिछले दो वर्षों में करीब 35 देशों के साथ क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम किया है। इनमें से 24 देशों के साथ समझौते हो चुके हैं, जबकि 11 देशों के साथ बातचीत जारी है। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, इटली, कांगो और हाल ही में इंडोनेशिया जैसे देश इस रणनीति का हिस्सा बने हैं। इसके अलावा चिली, पेरू, जाम्बिया, कजाकिस्तान और उजबेकिस्तान जैसे देशों के साथ भी बातचीत जारी है।
ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया पर खास नजर
इंडोनेशिया के साथ हालिया समझौते में निकेल और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों पर सहयोग को प्राथमिकता दी गई है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान लिथियम और यूरेनियम जैसे रणनीतिक संसाधनों पर भी सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। माना जा रहा है कि इन साझेदारियों से भारत की सप्लाई चेन अधिक मजबूत होगी और भविष्य में किसी एक देश पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा, रक्षा और नई तकनीकों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में यह रणनीति भारत के लिए लंबे समय तक महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।