पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब भारत की अर्थव्यवस्था पर असर दिखाने लगा है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की रफ्तार में अब धीमापन नजर आ रहा है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, प्राइवेट सेक्टर की ग्रोथ तीन साल से ज्यादा समय में सबसे कम हो गई है, जो बढ़ते वैश्विक संकट का साफ संकेत है।
PMI गिरा, बढ़ी चिंता
एचएसबीसी और S&P ग्लोबल के आंकड़ों के अनुसार मार्च में कंपोजिट पीएमआई घटकर 56.5 पर आ गया, जो फरवरी के 58.9 से काफी कम है। हालांकि यह अभी 50 के ऊपर है, यानी अर्थव्यवस्था विस्तार में है, लेकिन गिरावट यह दिखाती है कि ग्रोथ की रफ्तार कमजोर हो रही है।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर
सबसे ज्यादा दबाव मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ा है, जहां पीएमआई गिरकर 53.8 पर पहुंच गया, जो साढ़े चार साल का निचला स्तर है। बढ़ती लागत और सप्लाई चेन में बाधा के कारण फैक्ट्रियों का उत्पादन प्रभावित हुआ है। सर्विस सेक्टर में भी नरमी दिखी है।
महंगी ऊर्जा बनी सबसे बड़ी चुनौती
तेल और गैस की कीमतों में उछाल ने महंगाई को बढ़ा दिया है। होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट के कारण ऊर्जा सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे इनपुट लागत तेजी से बढ़ी है। मेटल, केमिकल और फूड जैसे सेक्टर भी इसकी चपेट में आ गए हैं।
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कंपनियों पर बढ़ा दबाव
बढ़ती लागत के चलते कंपनियों के सामने दोहरी चुनौती है—या तो कीमतें बढ़ाएं या मुनाफा कम करें। इसका असर उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है। हालांकि एक्सपोर्ट की मांग ने कुछ राहत दी है, लेकिन घरेलू खपत में कमी चिंता का विषय बनी हुई है।
आगे क्या हो सकता है असर
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर यह तनाव लंबा चला, तो महंगाई, चालू खाता घाटा और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। भारत की 90% कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी होती है, जिससे यह ऐसे झटकों के प्रति ज्यादा संवेदनशील है।
सरकार भी अलर्ट मोड में
सरकार ने स्थिति को देखते हुए आपात कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। गैस की प्राथमिकता तय की जा रही है और जरूरी सेक्टरों को सप्लाई सुनिश्चित करने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि नौकरियों में बढ़ोतरी जारी है, लेकिन इसकी रफ्तार धीमी पड़ गई है, जो आने वाले समय के संकेत दे रही है।