मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट ने दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। कई देश जहां घबराहट में आपात कदम उठा रहे हैं, वहीं भारत अपेक्षाकृत संतुलित नजर आ रहा है। हाल के दिनों में एलपीजी की सीमित कमी जरूर देखी गई, लेकिन हालात बिगड़ने से पहले ही सरकार ने अपनी वैकल्पिक रणनीति लागू कर दी। यही वजह है कि वैश्विक उथल-पुथल के बीच भी भारत में घबराहट का माहौल नहीं बना।
‘स्पेशल-41’ से बदल गया ऊर्जा समीकरण
भारत की इस रणनीति का मूल है ऊर्जा आयात का विस्तार, जिसे अनौपचारिक तौर पर ‘स्पेशल-41’ कहा जा रहा है। पहले जहां देश केवल 27 देशों से तेल-गैस आयात करता था, अब यह संख्या बढ़कर 41 तक पहुंच चुकी है। इस बदलाव ने भारत को खाड़ी देशों पर निर्भरता से काफी हद तक मुक्त कर दिया है। रूस, अंगोला, कांगो, गैबॉन और सूडान जैसे नए स्रोतों से तेल की आपूर्ति ने संकट के समय में सप्लाई चेन को मजबूत बनाए रखा है।
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नई सप्लाई लाइनों ने दिया बड़ा सहारा
मिडिल ईस्ट से आपूर्ति प्रभावित होने पर भारतीय रिफाइनरियों ने तेजी से पश्चिम अफ्रीका और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की ओर रुख किया। बाब-अल-मंडेब जैसे वैकल्पिक समुद्री मार्गों के जरिए तेल की खेपें भारत पहुंच रही हैं। इसके अलावा रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल आयात कर स्थिति को संतुलित किया गया। यही डायवर्सिफिकेशन भारत के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बनकर उभरा है।
पड़ोसी देशों में संकट, भारत में नियंत्रण
जहां पाकिस्तान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को ऊर्जा बचत के लिए सख्त कदम उठाने पड़े हैं, वहीं भारत ने स्थिति को बेहतर ढंग से संभाला है। देश के पास पर्याप्त रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार मौजूद है और इसे बढ़ाने की दिशा में काम जारी है। साथ ही घरेलू गैस उत्पादन, पाइप गैस नेटवर्क और वैकल्पिक ईंधनों पर जोर देकर भारत ने भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत करने की दिशा पकड़ ली है।