भारत की अर्थव्यवस्था इस समय दुनिया में सबसे तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही है। ऊंचे टैरिफ और वैश्विक तनाव के बावजूद घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है। महंगाई नियंत्रण में है और विकास दर लगातार बेहतर बनी हुई है। अमेरिका, जापान, जर्मनी या चीन जैसे बड़े देश भी इस रफ्तार के आसपास नहीं दिखते। लेकिन इस चमकती तस्वीर के पीछे एक चिंता लगातार गहराती जा रही है, और वह है चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा।
चीन के साथ रिकॉर्ड व्यापार और बढ़ता घाटा
साल 2025 में भारत और चीन के बीच व्यापार ने नया रिकॉर्ड बनाया। दोनों देशों के बीच कुल व्यापार 155.62 अरब डॉलर तक पहुंच गया। हालांकि इसी दौरान भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 116.12 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। यह दूसरी बार है जब भारत का चीन के साथ घाटा 100 अरब डॉलर से ज्यादा हुआ है। इससे साफ है कि भारत अभी भी कई जरूरी सामानों के लिए चीन पर काफी निर्भर है।
निर्यात बढ़ा, लेकिन आयात कहीं आगे
आंकड़ों के मुताबिक 2025 में भारत का चीन को निर्यात 19.75 अरब डॉलर रहा, जिसमें करीब 9.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं चीन से भारत का आयात 135.87 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यानी भारत के निर्यात में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन आयात की रफ्तार कहीं ज्यादा तेज है। इसी वजह से व्यापार संतुलन भारत के खिलाफ जाता दिख रहा है।
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किन क्षेत्रों से दिखी उम्मीद की किरण
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के निर्यात में बढ़ोतरी छोटी दिख सकती है, लेकिन यह अहम संकेत है। तेल खली, समुद्री उत्पाद, दूरसंचार उपकरण और मसालों जैसे भारतीय उत्पाद अब चीन के बाजार में जगह बना रहे हैं। भारत लंबे समय से सूचना तकनीक, दवा और कृषि उत्पादों के लिए चीनी बाजार खोलने की मांग करता रहा है। इन क्षेत्रों में भारत की पकड़ मजबूत मानी जाती है।
चीन का वैश्विक दबदबा बरकरार
चीन का वैश्विक व्यापार अभी भी मजबूत बना हुआ है। 2025 में चीन का व्यापार अधिशेष करीब 1.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया। निर्यात और आयात दोनों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अमेरिका के साथ तनाव के बावजूद चीन ने अपने व्यापारिक साझेदारों में विविधता लाकर खुद को मजबूत बनाए रखा है। यही वजह है कि उसका निर्यात दबदबा बना हुआ है।
विश्व बैंक की रिपोर्ट और आगे की चुनौती
इस बीच विश्व बैंक ने भारत के लिए वित्तीय वर्ष 2026 की विकास दर बढ़ाकर 7.2 प्रतिशत कर दी है। बैंक का कहना है कि मजबूत घरेलू मांग भारत की सबसे बड़ी ताकत है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन पर बढ़ती निर्भरता को कम करना अब जरूरी हो गया है। अगर इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठे, तो यही व्यापार घाटा भविष्य में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।