घर में रखा सोना भारतीय परिवारों की सबसे बड़ी बचत माना जाता है, लेकिन अब इसी पर नई बहस छिड़ गई है। सीए नितिन कौशिक ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि अगर देश के 1.4 अरब लोग सिर्फ एक-एक ग्राम सोना दान कर दें तो क्या होगा। उनके हिसाब से यह करीब 1400 टन सोना बन जाएगा। यह मात्रा भारतीय रिजर्व बैंक के भौतिक गोल्ड रिजर्व से भी ज्यादा होगी। लेकिन उन्होंने साफ कहा कि इतना सोना जमा होने से रुपया अचानक डॉलर के मुकाबले मजबूत नहीं हो जाएगा।
रुपया कैसे तय होता
कई लोगों को लगता है कि रिजर्व बैंक के पास ज्यादा सोना होने पर रुपये की कीमत अपने आप बढ़ जाएगी। नितिन कौशिक ने इसे गलत सोच बताया। उनका कहना है कि आज दुनिया की बड़ी मुद्राएं गोल्ड स्टैंडर्ड से नहीं चलतीं। रुपये की ताकत देश की अर्थव्यवस्था से तय होती है। इसमें महंगाई, व्यापार घाटा, विदेशी निवेश, निर्यात, उत्पादन और रोजगार जैसे कई मुद्दे शामिल होते हैं। सिर्फ सोने का भंडार बढ़ने से डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में कोई जादुई बदलाव नहीं आता।
सोना ढाल है रॉकेट नहीं
कौशिक के मुताबिक सोना किसी देश के लिए मुश्किल वक्त में सुरक्षा कवच जैसा काम करता है। युद्ध, वैश्विक संकट या बड़े आर्थिक झटके के समय गोल्ड रिजर्व भरोसा देता है। लेकिन यह करेंसी को ऊपर ले जाने वाला रॉकेट नहीं है। विदेशी मुद्रा बाजार यह नहीं देखता कि किसी केंद्रीय बैंक के लॉकर में कितना सोना पड़ा है। बाजार ज्यादा ध्यान इस बात पर देता है कि देश कितना उत्पादन कर रहा है, कितना सामान बेच रहा है और बाहर से कितना माल खरीद रहा है।
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लॉकरों में बंद संपत्ति
भारत में परिवारों और धार्मिक ट्रस्टों के पास अनुमान के मुताबिक 25 हजार टन से ज्यादा सोना मौजूद है। यह भारत को दुनिया के सबसे बड़े निजी गोल्ड मालिक देशों में शामिल करता है। लेकिन इसका बड़ा हिस्सा घरों के लॉकरों और तिजोरियों में बंद रहता है। इसे न तो कारोबार में लगाया जाता है और न ही इससे देश की आर्थिक गतिविधियों को सीधा सहारा मिलता है। इसी वजह से इसे अनुत्पादक संपत्ति भी कहा जाता है। सोना सुरक्षित जरूर रहता है, लेकिन उससे रोजाना आर्थिक काम नहीं बढ़ता।
आयात पर बढ़ता दबाव
देश में सोने की मांग लगातार बनी रहती है। शादी, त्योहार और निवेश के लिए लोग हर साल बड़ी मात्रा में सोना खरीदते हैं। घरेलू लॉकरों में पहले से बहुत सोना होने के बाद भी नई मांग पूरी करने के लिए भारत को विदेशों से सोना मंगाना पड़ता है। इसके लिए डॉलर खर्च होते हैं। जब आयात ज्यादा होता है तो व्यापार घाटा बढ़ सकता है। इसलिए सवाल उठता है कि क्या घरों में रखा सोना किसी सुरक्षित वित्तीय व्यवस्था के जरिए अर्थव्यवस्था के काम आ सकता है।
क्या है आगे का रास्ता
नितिन कौशिक का मानना है कि सोने को सिर्फ तिजोरी में रखने के बजाय वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने की जरूरत है। गोल्ड डिपॉजिट, गोल्ड बॉन्ड और दूसरे सुरक्षित विकल्पों के जरिए यह संपत्ति बाजार में आ सकती है। इससे आयात का दबाव कम हो सकता है और देश की बचत उत्पादक कामों में लग सकती है। हालांकि लोगों का भरोसा जीतना सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि भारतीय परिवारों के लिए सोना सिर्फ निवेश नहीं, बल्कि सुरक्षा, परंपरा और भावनाओं से जुड़ी संपत्ति भी है।