पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान युद्ध के बाद भारत ने अपनी आर्थिक रणनीति पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। युद्ध के दौरान सप्लाई चेन में आई बाधाओं और बढ़ते आयात बिल ने सरकार को यह एहसास कराया कि कई अहम क्षेत्रों में विदेशी निर्भरता भविष्य में बड़ा जोखिम बन सकती है। इसी वजह से अब केंद्र सरकार आयात कम करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए व्यापक योजना तैयार कर रही है। इसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से सुरक्षित बनाना और भारत को मजबूत मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में विकसित करना है।
100 से ज्यादा उत्पादों की होगी पहचान
सरकारी स्तर पर उन उत्पादों की पहचान की जा रही है जिनके लिए भारत अभी बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। सूत्रों के अनुसार, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय 100 से अधिक उत्पादों की सूची तैयार कर रहा है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल, जरूरी दवाएं, उर्वरक, सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल और मशीनरी जैसे सेक्टर शामिल हैं। सरकार इन क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए सब्सिडी और अन्य प्रोत्साहन देने पर भी विचार कर रही है।
युद्ध ने बढ़ाई आयात निर्भरता की चिंता
भारत की मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा हिस्सा अब भी विदेशों, खासकर चीन से आने वाले कच्चे माल पर निर्भर है। ईरान युद्ध के दौरान ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव और आयात लागत बढ़ने से यह कमजोरी और स्पष्ट हो गई। पिछले वित्त वर्ष में भारत ने लगभग 775 अरब डॉलर का आयात किया, जिसमें करीब पांचवां हिस्सा अकेले चीन से आया। इससे सरकार अब स्थानीय उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर ज्यादा जोर दे रही है।
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सरकार तैयार कर रही लंबी रणनीति
सरकार का लक्ष्य केवल आयात कम करना नहीं, बल्कि व्यापार घाटा घटाना, विदेशी मुद्रा की बचत करना और भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना भी है। सूत्रों के मुताबिक, शक्तिकांत दास की अगुवाई में एक टास्क फोर्स इम्पोर्ट सब्स्टीट्यूशन का ब्लूप्रिंट तैयार कर रही है। इसके तहत उन क्षेत्रों की पहचान की जा रही है जहां भारत कम लागत पर प्रतिस्पर्धी उत्पादन कर सकता है। निजी और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए नई प्रोत्साहन योजनाओं पर भी विचार किया जा रहा है।
इन क्षेत्रों पर रहेगा खास फोकस
सरकार मानती है कि कच्चे तेल, सोने और कुछ जरूरी खनिजों के आयात को तुरंत कम करना आसान नहीं होगा। हालांकि दाल, खाद्य तेल और उर्वरकों जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की योजना पर तेजी से काम हो रहा है। लक्ष्य अगले तीन वर्षों में उर्वरक आयात में 30 प्रतिशत तक कमी लाना है। इसके लिए बंद पड़े उर्वरक संयंत्रों को दोबारा शुरू करने और नए प्रोजेक्ट्स को तेजी से पूरा करने की तैयारी की जा रही है। सरकार का मानना है कि घरेलू उत्पादन बढ़ने से न केवल आयात पर निर्भरता घटेगी, बल्कि रोजगार, निवेश और आर्थिक मजबूती को भी नई गति मिलेगी।