India Inflation and Oil Prices : महंगा कच्चा तेल और कमजोर मानसून भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। एक तरफ तेल के बढ़ते दाम से देश का आयात बिल बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ बारिश की कमी से फसलों और किसानों की कमाई पर असर पड़ने का खतरा है। दोनों संकट एक साथ गहराए, तो खाने-पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के सामान तक की कीमतें बढ़ सकती हैं। ऐसे हालात में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने महंगाई पर काबू पाने और आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखने की चुनौती होगी।
महंगे तेल से बढ़ा आयात बिल
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच भारत का कच्चे तेल का आयात बिल बढ़कर 90.6 अरब डॉलर पहुंच गया। पिछले साल इसी अवधि में यह 61.9 अरब डॉलर था। इस दौरान तेल के आयात की मात्रा में बहुत मामूली बढ़ोतरी हुई। भारतीय कच्चे तेल की औसत कीमत जुलाई 2026 में करीब 82 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अक्टूबर में अब तक लगभग 120 डॉलर तक पहुंच गई। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसलिए कीमतें बढ़ने का सीधा असर देश के खर्च पर पड़ता है।
पेट्रोल-डीजल से लेकर सामान तक होंगे महंगे
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। माल ढुलाई, खेती में इस्तेमाल होने वाली मशीनों और उद्योगों की लागत भी बढ़ जाती है। कंपनियां इस बढ़े हुए खर्च का बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं। इससे रोजमर्रा की चीजें और सेवाएं महंगी हो सकती हैं। अगर रुपये की कीमत भी कमजोर होती है, तो विदेश से तेल खरीदना और महंगा पड़ता है। रेटिंग एजेंसी ICRA के आकलन के मुताबिक, तेल की कीमतें ऊंची बनी रहने पर वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की आर्थिक विकास दर 7.1 फीसदी के अनुमान से घटकर 6.8 फीसदी रह सकती है।
कम बारिश से किसानों की बढ़ी चिंता
महंगे तेल के साथ कमजोर मानसून ने भी अर्थव्यवस्था की चिंता बढ़ा दी है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सामान्य से करीब 13 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। उपलब्ध आकलन के मुताबिक, निगरानी वाले करीब 46.7 फीसदी क्षेत्रों में सूखे का असर देखा गया। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक ने 217 तहसीलों, महाराष्ट्र ने 265 तहसीलों और आंध्र प्रदेश ने 388 मंडलों को सूखा प्रभावित घोषित किया है। तेलंगाना और राजस्थान में भी फसलों को हुए नुकसान का आकलन जारी है। IIT गांधीनगर के इंडिया ड्रॉट मॉनिटर के मुताबिक, देश के 70.6 फीसदी क्षेत्र में सूखे या शुष्क परिस्थितियां दर्ज की गईं।
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फसल घटने से बढ़ सकती हैं खाने की कीमतें
कम बारिश का असर सोयाबीन और मूंगफली जैसी फसलों पर पड़ने की आशंका है। इनके उत्पादन में 20 फीसदी से ज्यादा गिरावट का अनुमान जताया गया है। अगर फसल कम होती है, तो किसानों की आमदनी घट सकती है। साथ ही अनाज, सब्जियों और खाने के तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी तरफ, महंगा ईंधन खेतों से मंडियों और बाजारों तक सामान पहुंचाने का खर्च बढ़ाता है। यानी एक तरफ उत्पादन घटने और दूसरी तरफ ढुलाई महंगी होने से खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा है। इससे आम परिवारों का बजट बिगड़ सकता है और ग्रामीण बाजारों में खरीदारी भी कमजोर पड़ सकती है।
RBI के सामने ब्याज दरों को लेकर चुनौती
महंगे तेल और बढ़ती खाद्य महंगाई का एक साथ सामना करना RBI के लिए मुश्किल हो सकता है। ब्याज दरें बढ़ाने से महंगाई पर काबू पाने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे कर्ज महंगा होता है और लोगों की खरीदारी तथा कारोबार में निवेश की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। खबर में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, RBI ने 7 अक्टूबर को रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50 फीसदी किया था। केंद्रीय बैंक ने महंगाई के जोखिमों में कमजोर बारिश, अल नीनो और ऊंची ऊर्जा कीमतों का भी जिक्र किया था। ऐसे में आगे के फैसले महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाने पर निर्भर करेंगे।