भारत ने हाल के महीनों में रूस से कच्चा तेल कम खरीदा है, लेकिन वह अब भी देश का सबसे बड़ा सप्लायर बना हुआ है। दूसरी तरफ सऊदी अरब से आयात में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। फरवरी में सऊदी से आने वाला तेल करीब 30 प्रतिशत बढ़ गया और उसकी मात्रा रूस के करीब पहुंच गई। इससे संकेत मिलते हैं कि भारत अपनी खरीद में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
सऊदी सप्लाई में तेज उछाल
फरवरी महीने में सऊदी अरब से रोजाना 10 लाख बैरल से ज्यादा तेल भारत पहुंचा। जनवरी में यह आंकड़ा करीब 7.7 लाख बैरल था। यानी एक महीने में ही बड़ा उछाल देखा गया। विशेषज्ञों के अनुसार पिछले कई सालों से सऊदी से आयात 6 से 7 लाख बैरल के बीच बना हुआ था, लेकिन अब यह छह साल के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है।
रूस अब भी सबसे आगे
हालांकि रूस से आयात में थोड़ी कमी आई है, फिर भी वह पहले स्थान पर बना हुआ है। फरवरी में रूस से रोजाना करीब 10 लाख बैरल से अधिक तेल आया। इससे पहले के महीनों में यह आंकड़ा और ज्यादा था। रूस से तेल सस्ता मिलने के कारण भारत ने पिछले कुछ समय में वहां से बड़ी मात्रा में खरीद की थी।
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पश्चिम एशिया की बढ़ती भूमिका
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया से भारत की सप्लाई बढ़ी है। इससे भारत के आयात बास्केट में खाड़ी देशों की हिस्सेदारी फिर बढ़ने लगी है। लेकिन ईरान संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण स्थिति बदल सकती है। बड़ी मात्रा में तेल इसी समुद्री रास्ते से होकर भारत आता है।
संकट से जहाजों की आवाजाही प्रभावित
खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के चलते जहाजों की आवाजाही पर असर पड़ा है। इससे भारतीय रिफाइनरी कंपनियां सतर्क हो गई हैं। बताया जा रहा है कि भारत के पास सीमित दिनों का तेल भंडार बचा है। अगर संकट लंबा चलता है तो सप्लाई प्रभावित हो सकती है और वैकल्पिक स्रोतों की तलाश तेज हो जाएगी।
क्या रूस से फिर बढ़ेगी खरीद?
ऐसी स्थिति में रूस से फिर अधिक खरीद की संभावना जताई जा रही है, क्योंकि उसके कई जहाज समुद्र में उपलब्ध हैं और रूट बदला जा सकता है। फिलहाल भारत संतुलन बनाकर चल रहा है, लेकिन आने वाले हफ्तों में वैश्विक हालात तय करेंगे कि देश का आयात पैटर्न किस दिशा में जाता है।