अमेरिका के साथ ट्रेड डील के बाद भारत की तेल खरीद नीति में बड़ा बदलाव आता दिख रहा है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक अब भारत रूस की जगह अमेरिका से ज्यादा कच्चा तेल और गैस खरीदने की तैयारी में है। तेल मंत्रालय और सरकारी तेल कंपनियों के बीच हाल ही में बैठकों का दौर चला, जिसमें यह आकलन किया गया कि अमेरिका से सप्लाई कितनी बढ़ाई जा सकती है। माना जा रहा है कि आने वाले महीनों में रूस से तेल आयात में धीरे-धीरे गिरावट देखने को मिल सकती है।
रूस से कम, अमेरिका से ज्यादा तेल
अभी तक रूस भारत का बड़ा तेल सप्लायर रहा है, लेकिन हालात बदल रहे हैं। घरेलू मांग बढ़ने और रूस से सप्लाई घटने की स्थिति में सबसे ज्यादा एडजस्टमेंट सरकारी तेल कंपनियों को करना पड़ सकता है। जानकारों के मुताबिक अमेरिका से आने वाला तेल पश्चिम एशिया के तेल के मुकाबले औसतन 2 डॉलर प्रति बैरल महंगा पड़ता है। इसके बावजूद रणनीतिक और कूटनीतिक कारणों से भारत अब इस विकल्प को गंभीरता से देख रहा है।
पीएम मोदी–ट्रंप बातचीत की पृष्ठभूमि
पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा था कि वे चाहते हैं कि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा तेल और गैस सप्लायर बने। इसके बाद भारत ने संकेत दिए कि वह अमेरिका से तेल आयात 15 अरब डॉलर से बढ़ाकर 25 अरब डॉलर तक ले जाना चाहता है। अब ट्रेड डील के बाद यह दिशा और मजबूत होती दिख रही है।
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अमेरिका से सप्लाई में तेज उछाल
आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल अमेरिका से भारत को कच्चे तेल की सप्लाई में करीब 60 फीसदी की तेजी आई और यह बढ़कर रोजाना 3.18 लाख बैरल तक पहुंच गई। इसके अलावा भारत ने अमेरिका से 2.2 मिलियन टन एलपीजी खरीदने का समझौता भी किया, जो देश के कुल एलपीजी आयात का लगभग 10 फीसदी है। एलएनजी की सप्लाई तो पहले से ही अमेरिका से हो रही है।
रूस से तेल पूरी तरह बंद नहीं होगा
हालांकि भारत रूस से तेल आयात पूरी तरह बंद नहीं करेगा। जो कार्गो पहले ही बुक हो चुके हैं, उनके मार्च तक भारत पहुंचने की संभावना है। जनवरी में इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और नयारा एनर्जी को ही रूसी तेल मिला था। फिर भी 2025 के औसत की तुलना में यह सप्लाई करीब 30 फीसदी कम रही। साफ है कि कटौती तो होगी, लेकिन पूरी तरह ब्रेक नहीं लगेगा।
चीन के हाथ में क्यों है असली चाबी?
असल पेच यहीं फंसता है। सवाल ये नहीं है कि भारत रूसी तेल को रिप्लेस कर पाएगा या नहीं, बल्कि ये है कि रूस अपना तेल कहां बेचेगा। अगर चीन ज्यादा डिस्काउंट पर रूसी तेल खरीद लेता है, तो वैश्विक सप्लाई बैलेंस बनी रह सकती है और कीमतें काबू में रहेंगी। लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ, तो रूसी उत्पादन प्रभावित होगा, सप्लाई टाइट होगी और इसका असर सीधे अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों पर पड़ेगा। यही वजह है कि अमेरिका के चक्कर में भारत का तेल खेल अब चीन की चाल पर भी निर्भर करता नजर आ रहा है।