भारत ने रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन में वह उपलब्धि हासिल कर ली है, जिसकी कल्पना दशकों तक केवल योजनाओं में होती थी। 1950 में जहां मात्र 0.7% रेल नेटवर्क इलेक्ट्रिक था, वहीं 2025 में यह रिकॉर्ड 98.8% तक पहुंच गया है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका, कनाडा, जापान और कोरिया जैसे विकसित देश भी इस मामले में भारत से काफी पीछे हैं। अमेरिका और कनाडा में इलेक्ट्रिफिकेशन 1% से भी कम है, जहां आज भी डीजल ट्रेनें हावी हैं। भारत, चीन और कुछ यूरोपीय देशों ने ही इस दिशा में असली प्रगति की है।
आज़ादी से 2000 तक, धीमी रफ्तार, छोटे कदम
आजादी के बाद इलेक्ट्रिफिकेशन शुरू तो हो गया, लेकिन गति बेहद धीमी रही। 1961 तक कुल नेटवर्क का केवल 1.3% ही बदला जा सका। 1971 में यह 7.6% हुआ और अगले 10 वर्षों में मामूली बढ़त के साथ 8.7% तक पहुंचा। 1981 से 1991 के बीच पहली बार रफ्तार पकड़ते हुए यह संख्या 16% तक पहुंची। 2001 तक यह 23.6% पर थी। यानी पहले 50 वर्षों में इलेक्ट्रिफिकेशन बहुत सीमित था और देश को तेज गति वाली रेलों का सपना अभी भी दूर लगता था।
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2014 के बाद आया असली मोड़
2011 तक भी भारत सिर्फ 29.6% नेटवर्क को इलेक्ट्रिक कर पाया था और 2014 में यह आंकड़ा 33% था। लेकिन इसके बाद रेलवे में लगातार हुए सुधार, आधुनिक तकनीक और तेज कामकाज ने तस्वीर बदल दी। 2020 में इलेक्ट्रिफिकेशन 58.7% तक पहुंच गया और 2025 आते-आते यह लगभग 98.8% हो गया। इतनी तेज गति दुनिया के किसी बड़े देश में नहीं देखी गई। आज भारत स्विट्जरलैंड और सिंगापुर जैसे देशों की श्रेणी में खड़ा है, जहां पूरा नेटवर्क इलेक्ट्रिक है।
भारत कैसे बना ग्लोबल लीडर?
जहां भारत 100% इलेक्ट्रिफिकेशन की ओर बढ़ रहा है, वहीं बेल्जियम 82%, साउथ कोरिया, स्वीडन, नीदरलैंड और जापान 75-78% पर हैं। यूके केवल 38% पर है और ऑस्ट्रेलिया सिर्फ 10% पर। यही आंकड़े बताते हैं कि भारत कैसे इस क्षेत्र में सुपरफास्ट देश बन चुका है। इलेक्ट्रिफिकेशन से न सिर्फ डीजल खर्च बचा, बल्कि प्रदूषण घटा, गति बढ़ी और रेलवे अधिक सुरक्षित व आधुनिक हुई।