भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील का ऐलान होते ही ऊर्जा बाजार में हलचल तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति लगातार यह दावा कर रहे हैं कि भारत ने रूसी तेल कम करने और वेनेजुएला से तेल लेने का भरोसा दिया है। दूसरी तरफ भारत की ओर से साफ किया गया है कि वह प्रतिबंधित देशों से तेल नहीं खरीदेगा। इसी बीच रूस ने भारत को लुभाने के लिए कच्चे तेल पर भारी छूट का नया ऑफर सामने रख दिया है। यह ऑफर ऐसे वक्त पर आया है, जब अमेरिका के साथ डील के चलते भारत के सामने रणनीतिक फैसला लेने की चुनौती खड़ी हो गई है।
रूसी तेल पर बढ़ी रिकॉर्ड छूट
पिछले कुछ दिनों में रूसी कच्चे तेल पर मिलने वाली छूट तेजी से बढ़ी है। बाजार से जुड़ी रिपोर्ट्स के मुताबिक रूस का यूराल्स ग्रेड तेल अंतरराष्ट्रीय ब्रेंट क्रूड के मुकाबले 10 से 11 डॉलर प्रति बैरल तक सस्ता मिल रहा है। यह छूट शिपिंग और अन्य लागत जोड़ने के बाद भी लागू है। जानकारों के मुताबिक जनवरी के मध्य तक यह छूट करीब 9 डॉलर थी, जो अब और बढ़ गई है। इतनी बड़ी छूट भारत की रिफाइनरियों के लिए फायदे का सौदा बन सकती है, क्योंकि इससे आयात बिल कम होता है और ईंधन सस्ता पड़ता है।
यूक्रेन युद्ध के बाद क्यों बढ़ी रूसी खरीद
भारत पारंपरिक रूप से रूस से बड़ी मात्रा में तेल नहीं खरीदता था। लेकिन 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद जब रूस पर पश्चिमी प्रतिबंध लगे, तब डिस्काउंट के चलते भारत ने रूसी तेल की खरीद बढ़ाई। इसी वजह से भारत को सस्ता क्रूड मिला और घरेलू बाजार में महंगाई पर कुछ हद तक नियंत्रण भी बना रहा। हाल के महीनों में खरीद थोड़ी घटी है, लेकिन फिर भी रूस भारत के बड़े सप्लायर्स में बना हुआ है।
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केप्लर रिपोर्ट क्या कहती है
एनर्जी डेटा फर्म केप्लर के अनुसार, भारत का रूस से पूरी तरह अलग होना निकट भविष्य में संभव नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि भारत का रूसी तेल आयात आने वाले महीनों में करीब 1.1 से 1.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन के बीच रह सकता है। केप्लर के मुताबिक रूसी तेल अभी भी वेनेजुएला के तेल से 4 से 5 डॉलर प्रति बैरल सस्ता पड़ रहा है। यही वजह है कि भारतीय रिफाइनरियां पूरी तरह रूस से दूरी बनाने के पक्ष में नहीं दिखतीं।
अमेरिका की शर्तें और भारत की मजबूरी
अमेरिका के साथ ट्रेड डील भारत के लिए अहम है, क्योंकि वहां भारत का व्यापार सरप्लस रहता है। वहीं रूस के साथ भारत ट्रेड डेफिसिट में है, लेकिन सस्ता तेल भारत की बड़ी जरूरत भी है। अमेरिकी राष्ट्रपति पहले रूसी तेल पर भारत पर अतिरिक्त टैरिफ की बात कर चुके थे, जिसे अब ट्रेड डील के साथ हटाया गया है। इससे भारत को थोड़ी राहत जरूर मिली है, लेकिन भविष्य की दिशा अभी साफ नहीं है।
अब भारत का अगला कदम क्या होगा
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारत आगे क्या करेगा। क्या वह अमेरिका के साथ रिश्ते मजबूत रखने के लिए रूसी तेल से दूरी बनाएगा या फिर सस्ते रूसी क्रूड का फायदा उठाता रहेगा। एक तरफ रणनीतिक साझेदारी और व्यापार समझौते हैं, तो दूसरी तरफ ऊर्जा सुरक्षा और सस्ती आपूर्ति। आने वाले दिनों में भारत का फैसला न सिर्फ उसकी ऊर्जा नीति, बल्कि वैश्विक कूटनीति में उसकी भूमिका भी तय करेगा।