भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही द्विपक्षीय व्यापार समझौता (BTA) वार्ता अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच प्रस्तावित समझौते की पहली किश्त पर जल्द हस्ताक्षर हो सकते हैं। उनके अनुसार अधिकांश महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सहमति बन चुकी है और अब केवल अंतिम औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं।
नई दिल्ली में शुरू हुआ अहम वार्ता दौर
मुख्य वार्ताकार ब्रेंडन लिंच के नेतृत्व में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल 1 से 4 जून तक भारत दौरे पर है। इस दौरान दोनों देशों के अधिकारी कई दौर की बैठकों में शामिल होंगे। भारत की ओर से अतिरिक्त सचिव दर्पण जैन के नेतृत्व में टीम बातचीत कर रही है। माना जा रहा है कि इन बैठकों में अंतरिम व्यापार समझौते के शेष बिंदुओं को अंतिम रूप दिया जाएगा, जिससे आगे व्यापक व्यापार साझेदारी का रास्ता साफ हो सके।
लगभग सभी बड़े मुद्दों पर बनी सहमति
सरकार के मुताबिक समझौते से जुड़े लगभग सभी प्रमुख मुद्दों पर सहमति बन चुकी है। हाल ही में भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी कहा था कि समझौते का करीब 99 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। इससे यह संकेत मिल रहा है कि दोनों देश अब अंतिम चरण की बातचीत में हैं। समझौते के बाद दोनों पक्ष अधिक व्यापक और दीर्घकालिक व्यापार ढांचे पर भी चर्चा आगे बढ़ाएंगे।
ये भी पढ़ें : AI का जादू या अरबों का जुआ? Google-Microsoft तक पूछ रहे सवाल, आखिर कहां जा रहा पैसा
कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर रहेगा फोकस
इस समझौते में बाजार पहुंच, गैर-टैरिफ बाधाएं, सीमा शुल्क प्रक्रियाएं, व्यापार सुविधा, निवेश प्रोत्साहन और आर्थिक सुरक्षा जैसे अहम विषय शामिल हैं। साथ ही अमेरिकी टैरिफ संरचना में हुए हालिया बदलावों को भी वार्ता का हिस्सा बनाया गया है। दोनों देश ऐसे मॉडल पर काम कर रहे हैं जिससे व्यापार को बढ़ावा मिले और दोनों अर्थव्यवस्थाओं को समान लाभ प्राप्त हो सके।
व्यापारिक रिश्तों को मिल सकती है नई गति
प्रस्तावित समझौते के तहत भारत ने कई अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर शुल्क कम करने या समाप्त करने का प्रस्ताव दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता तय समय पर लागू होता है तो दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को नई गति मिल सकती है। पिछले दो दशकों में भारत और अमेरिका के बीच वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार 20 अरब डॉलर से बढ़कर 220 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है। ऐसे में यह समझौता भविष्य में आर्थिक साझेदारी को और मजबूत बनाने वाला महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।