भारतीय करेंसी पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है और बुधवार को रुपया इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। ट्रेडिंग की शुरुआत 89.97 पर हुई और देखते ही देखते रुपया 90 के मनोवैज्ञानिक स्तर को तोड़कर 90.14 प्रति डॉलर तक गिर गया। यह अब तक का सबसे खराब स्तर है। बैंकों के इंपोर्टर्स द्वारा भारी मात्रा में डॉलर खरीदने और भारत–अमेरिका ट्रेड डील में देरी इस तेज गिरावट के बड़े कारण माने जा रहे हैं। डीलरों का कहना है कि 90 के नीचे जाना अनुमानित था, लेकिन इतना तेजी से होगा ऐसा किसी को नहीं लगा था। बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है और RBI के दखल की भी चर्चाएं हैं।
2025 में रुपया क्यों टूटा?
साल 2025 भारतीय रुपये के लिए बेहद खराब साबित हो रहा है। डॉलर के मुकाबले करेंसी करीब 5% कमजोर हो चुकी है। विदेशी बाजारों में बिकवाली, ग्लोबल अनिश्चितता, ट्रेड डील में देरी और घरेलू आर्थिक संकेतक मिलकर रुपये को लगातार कमजोर कर रहे हैं। डीलरों का कहना है कि फिलहाल टेक्निकल सपोर्ट 90.20 पर है, जिसे अगर यह पार करता है तो स्थिति और बिगड़ सकती है। रुपये में इस तेजी से गिरावट ने निवेशकों और बाजार दोनों की धड़कनें बढ़ा दी हैं।
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अर्थव्यवस्था पर सीधा असर
किसी देश की करेंसी जब लगातार टूटती है, तो इसका सीधा असर उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। रुपये की कमजोरी सबसे पहले महंगाई का खतरा बढ़ाती है। भारत अपनी जरूरत का करीब 80% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में कमजोर रुपया मतलब तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करना। यही लागत आगे बढ़कर पेट्रोल-डीजल के दामों पर असर डालती है। तेल महंगा होगा तो ट्रांसपोर्टेशन और लॉजिस्टिक्स कॉस्ट बढ़ेगी और इसका असर आम जनता की जेब पर दिखाई देगा।
महंगाई और बाजार की नई चिंता
रुपये की गिरावट केवल तेल ही नहीं, बल्कि अन्य आयातित वस्तुओं को भी महंगा बना देती है इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयां, मशीनें, कंज्यूमर गुड्स सबकी कीमतों पर दबाव बढ़ने लगता है। महंगाई बढ़ने पर घरेलू बाजार धीमा पड़ता है और उद्योग भी प्रभावित होते हैं। यही कारण है कि सरकार और RBI दोनों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। अगर गिरावट पर जल्द रोक नहीं लगी, तो आने वाले महीनों में आम लोगों से लेकर कारोबारियों तक सबको जेब पर बड़ा बोझ झेलना पड़ सकता है।