भारतीय रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है। गुरुवार को शुरुआती कारोबार में रुपया 20 पैसे टूटकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.86 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। इससे पहले भी रुपया लगातार कई कारोबारी सत्रों में नए ऑल टाइम लो छू चुका है। कमजोर होती करेंसी ने बाजार और निवेशकों दोनों की चिंता बढ़ा दी है।
कच्चे तेल की कीमतें बनी बड़ी वजह
रुपये की गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें मानी जा रही हैं। Brent Crude 106 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल और करीब 50 प्रतिशत गैस आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने से देश का आयात बिल और डॉलर की मांग दोनों बढ़ जाते हैं।
पश्चिम एशिया संकट का असर
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी है। Strait of Hormuz में बढ़ती अस्थिरता की वजह से ऊर्जा सप्लाई पर दबाव बना हुआ है। इससे निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है और सुरक्षित निवेश की तलाश में डॉलर की मांग बढ़ रही है।
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विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी
भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली भी रुपये पर दबाव बढ़ा रही है। आंकड़ों के मुताबिक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने हालिया कारोबारी सत्र में हजारों करोड़ रुपये के शेयर बेचे। इससे डॉलर की मांग और तेज हो गई, जिसका असर सीधे रुपये पर पड़ा।
RBI भी कर चुका है बड़ा हस्तक्षेप
Reserve Bank of India रुपये की गिरावट को रोकने के लिए बाजार में अरबों डॉलर झोंक चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर केंद्रीय बैंक हस्तक्षेप नहीं करता तो रुपया और ज्यादा कमजोर हो सकता था। हालांकि वैश्विक हालात और तेल कीमतों में तेजी के चलते दबाव अभी भी बना हुआ है।
एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा बना रुपया
इस साल अब तक रुपया एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल हो गया है। जानकारों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया संकट लंबा चलता है और तेल कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो आने वाले समय में रुपये पर और दबाव देखने को मिल सकता है।