Unemployment and the impact of war: ईरान इस समय गंभीर आर्थिक और सामाजिक संकट के दौर से गुजर रहा है, जिसका असर देश की सड़कों पर साफ नजर आ रहा है। बीते तीन दिनों से कई बड़े शहरों में हिंसक प्रदर्शन जारी हैं। महंगाई, बेरोजगारी और मुद्रा रियाल की ऐतिहासिक गिरावट ने आम नागरिकों का जीवन मुश्किल बना दिया है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि जो विरोध पहले रोजमर्रा की परेशानियों तक सीमित थे, वे अब सीधे सरकार के खिलाफ और शासन बदलने की मांग में तब्दील हो चुके हैं। लोगों का गुस्सा सिर्फ आर्थिक नीतियों तक नहीं रह गया, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल उठने लगे हैं।
रियाल की गिरावट और आंदोलन का विस्तार
इन प्रदर्शनों की चिंगारी तब भड़की जब ईरानी मुद्रा रियाल रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई। एक अमेरिकी डॉलर की कीमत करीब 14 लाख रियाल तक पहुंचने से आयात महंगा हो गया और जरूरी सामान आम लोगों की पहुंच से बाहर होने लगा। सबसे पहले तेहरान के ग्रैंड बाजार और मोबाइल बाजार के व्यापारियों ने हड़ताल कर दुकानें बंद कीं। कुछ ही दिनों में यह विरोध राजधानी से बाहर निकलकर इस्फहान, शिराज, यज्द और केरमानशाह जैसे शहरों तक फैल गया। जब विश्वविद्यालयों के छात्र भी इस आंदोलन में शामिल हुए, तो प्रदर्शन पूरी तरह राजनीतिक रंग लेने लगे। सड़कों पर अब ऐसे नारे सुनाई देने लगे हैं, जो सीधे सत्ता और शासन व्यवस्था को चुनौती देते हैं।
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सरकारी सख्ती, युद्ध और प्रतिबंधों का असर
सरकार ने हालात संभालने के लिए बातचीत और सख्ती, दोनों रास्ते अपनाने की कोशिश की, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने आर्थिक हालात को कठिन बताते हुए टैक्स बढ़ाने और बजट संकट की बात कही, लेकिन इससे लोगों का गुस्सा और बढ़ गया। दूसरी ओर सुरक्षा बलों ने कई इलाकों में आंसू गैस और बल प्रयोग किया, साथ ही 18 प्रांतों में दफ्तर और विश्वविद्यालय बंद कर दिए गए। विश्लेषकों के मुताबिक ये कदम बहुत देर से उठाए गए। हालात को और बिगाड़ने में हालिया युद्ध और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की बड़ी भूमिका रही है। इजरायल और अमेरिका के साथ हुई लड़ाई में भारी जान-माल का नुकसान हुआ, जिसके बाद पुराने प्रतिबंध दोबारा लागू कर दिए गए। इन सबने मिलकर ईरान की अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में धकेल दिया है, और यही वजह है कि आज सड़कों पर सिर्फ महंगाई नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन की मांग गूंज रही है।