ईरान से करीब 20 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर एक टैंकर गुजरात तट पर पहुंचा, लेकिन भारत ने इस शिपमेंट को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक इस टैंकर के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है कि इसे किसने खरीदा और यह किस सौदे के तहत आया। यही अनिश्चितता सबसे बड़ी वजह बनी है।
क्यों ठुकराया गया तेल
जानकारी के अनुसार यह टैंकर निर्धारित समय सीमा के बाद लोड किया गया था। अमेरिका ने ईरान के तेल पर लगे प्रतिबंधों में सीमित छूट दी थी, जिसके तहत केवल 20 मार्च से पहले लोड हुए तेल को ही बेचा जा सकता था। लेकिन यह शिपमेंट 28 मार्च को लोड किया गया, जिससे यह छूट की शर्तों से बाहर हो गया।
अमेरिकी प्रतिबंधों का डर
यदि भारत इस तेल को स्वीकार करता तो उस पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगने का खतरा था। यही कारण है कि भारतीय रिफाइनरियों ने इस शिपमेंट से दूरी बना ली। अमेरिकी वित्त विभाग द्वारा दी गई छूट की समय सीमा 19 अप्रैल तक ही थी और इसके बाद लोड हुए तेल पर कोई राहत लागू नहीं होती।
ये भी पढ़ें : LPG सप्लाई पर संकट गहराया, पूरी तरह सुधार में लग सकते हैं 4 साल
बड़ा टैंकर, लेकिन खरीदार नहीं
यह टैंकर एक बहुत बड़ा क्रूड कैरियर था, जिसे वीएलसीसी श्रेणी में रखा जाता है। Kpler के अनुसार यह टैंकर गुजरात के पास पहुंचा लेकिन इसमें ज्यादा हलचल नहीं दिखी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस शिपमेंट के लिए चीन के अलावा अन्य खरीदार मिलना मुश्किल हो सकता है।
अमेरिका-ईरान तनाव का असर
हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत विफल रही है, जिसके बाद हालात और तनावपूर्ण हो गए हैं। अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर दबाव बढ़ा दिया है और संकेत दिए हैं कि वह प्रतिबंधों में दी गई छूट को आगे नहीं बढ़ाएगा।
भारत की सतर्क रणनीति
भारत ने पहले छूट की अवधि के भीतर कुछ ईरानी तेल खरीदा था, लेकिन इस बार समय सीमा पार होने के कारण जोखिम नहीं लिया गया। यह फैसला दिखाता है कि भारत वैश्विक नियमों और आर्थिक जोखिमों को ध्यान में रखकर कदम उठा रहा है।
ग्लोबल सप्लाई पर असर
ईरान से आने वाले तेल की अनिश्चितता का असर वैश्विक बाजार पर भी पड़ सकता है। सप्लाई चेन पहले ही तनाव में है और ऐसे में इस तरह की घटनाएं कीमतों और उपलब्धता दोनों को प्रभावित कर सकती हैं।
आगे क्या होगा
फिलहाल यह टैंकर गुजरात के पास ही रुका हुआ है और उसके भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। यह मामला दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति का असर सीधे ऊर्जा व्यापार और देशों के फैसलों पर पड़ता है।