मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, खासकर ईरान से जुड़ी स्थिति ने भारतीय मुद्रा पर गहरा असर डाला है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और विदेशी निवेशकों द्वारा पैसा निकालने की वजह से रुपया दबाव में आ गया है। भारतीय रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, रुपये का रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट यानी REER गिरकर 92.72 पर पहुंच गया है, जो एक दशक में सबसे निचले स्तरों में से एक है।
औसत से काफी नीचे पहुंचा स्तर
REER का यह स्तर इसके लंबे समय के औसत 98.25 से काफी नीचे है। यह साफ दिखाता है कि रुपये की वास्तविक वैल्यू में बड़ी गिरावट आई है। महंगाई में कमी के बावजूद रुपये पर दबाव बना हुआ है और इस साल अब तक इसमें करीब 4.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
रिकॉर्ड निचले स्तर का असर
मार्च के अंत में रुपया 95.21 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गया था, जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव का सीधा असर रुपये पर पड़ता है।
जल्द सुधार की उम्मीद कम
विश्लेषकों के अनुसार, मौजूदा हालात में रुपये में तेजी से सुधार की संभावना कम है। डॉलर की बढ़ती मांग, तेल आयात का दबाव और निवेशकों का जोखिम से बचना रुपये को कमजोर बनाए रख सकता है। शेयर बाजार से विदेशी निवेश का निकलना भी स्थिति को और कठिन बना रहा है।
ये भी पढ़ें : बुलेट स्पीड से मंजूरी, अब Bullet Train प्रोजेक्ट को मिलेगी फास्ट क्लियरेंस, देशभर में दौड़ेगी हाईस्पीड रेल
व्यापार पर मिला-जुला असर
रुपये की कमजोरी का एक पहलू यह भी है कि इससे भारत के निर्यात सस्ते हो जाते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ती है। लेकिन दूसरी ओर आयात महंगे हो जाते हैं, जिससे देश के व्यापार संतुलन पर असर पड़ता है।
अन्य करेंसी इंडेक्स भी कमजोर
6-करेंसी इंडेक्स के अनुसार भी रुपये की स्थिति कमजोर बनी हुई है। मार्च में यह इंडेक्स गिरकर 89.61 तक पहुंच गया, जो 2015 के बाद का सबसे निचला स्तर है। यह संकेत देता है कि वैश्विक स्तर पर भी रुपये की स्थिति कमजोर बनी हुई है।
बड़े व्यापारिक साझेदारों का असर
भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में अमेरिका, चीन, यूएई, रूस, सऊदी अरब और सिंगापुर शामिल हैं। इन देशों के साथ व्यापार में बदलाव का असर भी रुपये की चाल पर पड़ता है।
आगे की स्थिति पर नजर
आने वाले समय में रुपये की दिशा काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक आर्थिक माहौल पर निर्भर करेगी। अगर हालात स्थिर नहीं हुए, तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है और आर्थिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं।