पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े हालात के बीच भारत की औद्योगिक उत्पादन वृद्धि दर मार्च 2026 में गिरकर 4.1 प्रतिशत पर आ गई है। यह पिछले पांच महीनों का सबसे निचला स्तर है। आंकड़ों के अनुसार फरवरी में यह दर 5.1 प्रतिशत थी, जबकि एक साल पहले मार्च में 3.9 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इससे साफ है कि वैश्विक हालात का असर अब भारतीय उद्योग पर भी दिखने लगा है।
सेक्टरवार प्रदर्शन कमजोर
सांख्यिकी मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार में गिरावट आई है। फरवरी में जहां यह 5.9 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा था, वहीं मार्च में यह घटकर 4.3 प्रतिशत रह गया। बिजली उत्पादन में भी बड़ी गिरावट देखने को मिली, जो 2.3 प्रतिशत से घटकर सिर्फ 0.8 प्रतिशत पर आ गया। हालांकि खनन क्षेत्र में सुधार देखने को मिला और यह 5.5 प्रतिशत की दर से बढ़ा।
गिरावट की बड़ी वजह
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी ने उत्पादन लागत को बढ़ा दिया है। इससे कंपनियों की लागत बढ़ी और उत्पादन की गति पर असर पड़ा। कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक अनिश्चितता ने भी उद्योगों को दबाव में डाल दिया है।
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विशेषज्ञों की चेतावनी
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार मौजूदा आंकड़े सिर्फ शुरुआती असर दिखा रहे हैं। उनका कहना है कि अगर पश्चिम एशिया में हालात लंबे समय तक तनावपूर्ण रहते हैं तो इसका असर और गहरा हो सकता है। अनिश्चितता के चलते निवेश और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं, जिससे आने वाले महीनों में स्थिति और चुनौतीपूर्ण बन सकती है।
आगे की राह पर नजर
अब सभी की नजर आने वाले महीनों पर है, जहां यह देखा जाएगा कि भारत इस वैश्विक दबाव से कैसे निपटता है। अगर ऊर्जा कीमतें स्थिर होती हैं और सप्लाई चेन में सुधार आता है तो औद्योगिक उत्पादन में फिर से तेजी लौट सकती है। फिलहाल यह साफ है कि वैश्विक संकट का सीधा असर देश की आर्थिक रफ्तार पर पड़ रहा है।