पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध और तनाव का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। खास तौर पर ईरान से जुड़े संघर्ष के लंबे समय तक चलने की आशंका के बीच रुपये पर दबाव बढ़ गया है। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन भारतीय करेंसी में गिरावट दर्ज की गई। डॉलर के मुकाबले रुपया 13 पैसे टूटकर 92.43 के स्तर तक पहुंच गया, जिससे बाजार में चिंता का माहौल बन गया है।
डॉलर के मुकाबले क्यों कमजोर हुआ रुपया
विशेषज्ञों का मानना है कि भू-राजनीतिक तनाव के कारण विदेशी निवेशक सतर्क हो गए हैं और बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी भी रुपये पर दबाव बना रही है। विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार, वैश्विक अनिश्चितता के कारण भारतीय मुद्रा लगातार दबाव में है और इसी वजह से इसमें कमजोरी देखी जा रही है।
विदेशी मुद्रा बाजार में कैसा रहा कारोबार
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया 92.44 प्रति डॉलर के स्तर पर खुला। इसके बाद दिनभर के कारोबार के दौरान यह करीब 92.43 प्रति डॉलर के आसपास बना रहा। इससे पहले शुक्रवार को भी रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर 92.30 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। लगातार गिरावट के कारण निवेशकों और कारोबारियों के बीच चिंता बढ़ती जा रही है।
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शेयर बाजार में दिखी हल्की मजबूती
दिलचस्प बात यह है कि रुपये में गिरावट के बीच शेयर बाजार में थोड़ी तेजी देखने को मिली। कारोबार की शुरुआत में बीएसई सेंसेक्स करीब 139 अंक बढ़कर 74,703 के आसपास पहुंच गया। वहीं निफ्टी भी करीब 51 अंक की बढ़त के साथ 23,200 के स्तर पर पहुंच गया। हालांकि बाजार में यह तेजी बहुत सीमित रही और निवेशकों का रुख अब भी सतर्क नजर आ रहा है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें बनी बड़ी वजह
रुपये पर दबाव बढ़ने की एक बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में तेजी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत करीब 104 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए तेल महंगा होने का सीधा असर भारतीय मुद्रा और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
विदेशी निवेश और भंडार में गिरावट
शेयर बाजार के आंकड़ों के मुताबिक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने हाल के दिनों में बड़ी मात्रा में शेयर बेचे हैं। एक दिन में ही करीब 10,700 करोड़ रुपये के शेयरों की बिकवाली दर्ज की गई। इसके अलावा देश के विदेशी मुद्रा भंडार में भी गिरावट आई है और यह घटकर करीब 716 अरब डॉलर रह गया है। इससे भी रुपये पर दबाव बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।