ईरान पर इजरायल और अमेरिका की कार्रवाई के बाद जारी युद्ध अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डालने लगा है। 20 दिनों से जारी इस संघर्ष ने कच्चे तेल की कीमतों को ऊंचाई पर पहुंचा दिया है, जिसका सीधा असर भारत पर दिखने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट भारत के कॉर्पोरेट सेक्टर के साथ-साथ आम आदमी की जेब पर भी भारी पड़ सकता है।
किन सेक्टर्स पर सबसे ज्यादा असर
ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और महंगे फ्रेट चार्जेस के कारण कई उद्योगों की लागत बढ़ रही है। एयरलाइंस सेक्टर, जो करीब 48.7% तक ईंधन पर निर्भर है, सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा पेंट, टायर, केमिकल्स, फर्टिलाइजर, सिरेमिक, टाइल्स, सिंथेटिक कपड़े और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री पर भी दबाव बढ़ेगा। खासतौर पर MSME सेक्टर के लिए यह स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगी, क्योंकि इनके पास लागत बढ़ने का झटका झेलने की क्षमता सीमित होती है।
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कच्चे माल की कीमतों में उछाल
पेट्रोकेमिकल आधारित उत्पादों की लागत तेजी से बढ़ रही है। इनपुट प्राइस इंडेक्स 15 महीने के उच्च स्तर तक पहुंच चुका है, जो उत्पादन लागत में बढ़ोतरी का संकेत देता है। कॉपर, एल्युमिनियम और पीतल जैसे धातुओं के दाम में दो अंकों की वृद्धि देखी गई है, जिससे निर्माण और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर दबाव और बढ़ गया है।
महंगाई में तेजी के संकेत
कच्चे तेल और गैस की कीमतों का असर सीधे थोक महंगाई पर पड़ता है। फरवरी में थोक महंगाई पहले ही 11 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है और अनुमान है कि यह मार्च में और बढ़ सकती है। यदि कच्चे तेल की कीमतों में 10% की और वृद्धि होती है, तो महंगाई में 100 से 150 बेसिस पॉइंट तक उछाल आ सकता है, जिससे बाजार में वस्तुओं के दाम तेजी से बढ़ेंगे।
आम आदमी की जेब पर असर
इस पूरे संकट का सबसे बड़ा असर आम लोगों पर पड़ेगा। कंपनियां बढ़ती लागत का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाल सकती हैं, जिससे प्रोसेस्ड फूड, कपड़े और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वित्त वर्ष 2026-27 में खुदरा महंगाई 5% से 5.5% के बीच रह सकती है और इसका असर अगले कुछ महीनों में साफ तौर पर दिखाई देने लगेगा।