
बीते हफ्ते इजरायल ने कतर की राजधानी दोहा पर हमला किया और दावा किया कि उसने हमास के सीनियर कमांडरों को मार गिराया है. इस वारदात ने पूरे इस्लामिक जगत में भूचाल ला दिया. आज दोहा में 50 मुस्लिम देशों के नेता जुट रहे हैं ताकि एक साझा रणनीति बनाई जा सके. इसे इजरायल की ओर से रेड लाइन पार करना माना जा रहा है. खबर है कि इस समिट से अमेरिका पर भी दबाव बनेगा कि वो इजरायल को कंट्रोल करे, वरना हालात विस्फोटक हो सकते हैं.
तुर्की की बढ़ी चिंता, हमले का डर
जानकारों का कहना है कि ये समिट सिर्फ कतर हमले की वजह से नहीं हो रही, बल्कि इसमें तुर्की की भी चिंता छिपी है. इजरायली आर्मी चीफ एयाल जामिर पहले ही कह चुके हैं कि हमास की लीडरशिप गाजा के बाहर भी है और उन्हें टारगेट किया जाएगा. कतर पर हमला इसी पॉलिसी का हिस्सा है. अब तुर्की डर रहा है क्योंकि उसके यहां भी लंबे समय से हमास नेताओं को शरण और समर्थन मिलता रहा है. अगर कतर पर हमला हो सकता है, तो तुर्की खुद को कैसे सुरक्षित माने?
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इजरायल ने की दुस्साहस की हरकत
पिछले दो सालों में इजरायल सिर्फ कतर ही नहीं, बल्कि यमन, लेबनान, ईरान, सीरिया और फिलिस्तीन तक को टारगेट कर चुका है यानी 6 देशों पर हमले. ऐसे में जानकारों का कहना है कि ये तुर्की का डर वाजिब है. खासकर तब जब एर्दोआन की सत्ता में आने के बाद इजरायल और तुर्की के रिश्ते लगातार खराब हुए हैं. तुर्की मान रहा है कि अब इजरायल का अगला निशाना वही हो सकता है. कतर पर हमला होना अपने आप में बड़ा संदेश है. यहां अमेरिकी एयरबेस मौजूद है और कतर अमेरिका का अहम सहयोगी माना जाता है. इसके बावजूद इजरायल ने हमला किया, ये बताने के लिए कि वो किसी भी कीमत पर किसी को छोड़ने वाला नहीं. यही बात तुर्की की बेचैनी और बढ़ा रही है. आखिरकार तुर्की भी अमेरिका का सहयोगी और नाटो का सदस्य है. लेकिन जब कतर जैसे देश को भी बख्शा नहीं गया तो अंकारा खुद को कितना सुरक्षित मान सकता है? यही सवाल पूरी इस्लामिक दुनिया को बेचैन कर रहा है.