दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के ‘संसद चलो’ प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा का मामला अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने के बाद अब हिंसा में घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों ने भी शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है। परिवारों की मांग है कि प्रदर्शन से जुड़े दिशानिर्देश बनाते समय ऑन-ड्यूटी पुलिसकर्मियों के अधिकार और उनकी सुरक्षा को भी बराबर महत्व दिया जाए।
चार पुलिसकर्मियों के परिवार ने दायर की याचिका
यह याचिका घायल एएसपी कैलाश सिंह बिष्ट, एएसआई संदीप, कॉन्स्टेबल धीरज और एएसआई हेमेन्दर राठी के परिवार के सदस्यों ने संयुक्त रूप से दायर की है। याचिकाकर्ताओं में लक्ष्य सिंह बिष्ट, कुंजल, निशा यादव और अक्षत राठी शामिल हैं। उनकी मांग है कि प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई से जुड़ी मुख्य याचिका में उन्हें भी पक्षकार बनाया जाए, ताकि अदालत के सामने घायल पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों का पक्ष भी रखा जा सके।
200 पुलिसकर्मियों के घायल होने का दावा
याचिका में दावा किया गया है कि 20 से 25 जुलाई 2026 के बीच जंतर-मंतर पर 20 हजार से ज्यादा प्रदर्शनकारियों की भीड़ को संभालने के लिए बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। 20 जुलाई को बैरिकेड्स तोड़े जाने और उसके बाद हुई हिंसा में 130 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए। वहीं 24 और 25 जुलाई को पथराव और नुकीली टाइलों से हमले का आरोप लगाया गया है। याचिका के मुताबिक पूरे घटनाक्रम में घायल पुलिसकर्मियों की संख्या करीब 200 तक पहुंच गई।
ये भी पढ़ें : भारी बारिश-भूस्खलन से चारधाम यात्रा पर ब्रेक, दो दिन नहीं जा सकेंगे श्रद्धालु; मौसम सुधरने पर फिर होगी शुरू
‘पुलिसकर्मियों को भी मिले अनुच्छेद 21 का संरक्षण’
पुलिसकर्मियों के परिवारों ने संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 14 का भी हवाला दिया है। उनका तर्क है कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ समानता का अधिकार ऑन-ड्यूटी पुलिसकर्मियों को भी उसी तरह मिलता है जैसे देश के किसी दूसरे नागरिक को। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संविधान लोगों को विरोध और अपनी बात रखने का अधिकार देता है, लेकिन इसका मतलब ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा करने की आजादी नहीं है।
प्रदर्शन की गाइडलाइन में पुलिस का पक्ष भी शामिल करने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि भविष्य में विरोध प्रदर्शनों को लेकर अगर राष्ट्रीय स्तर पर कोई दिशानिर्देश बनाए जाते हैं तो उनमें पुलिसकर्मियों की सुरक्षा का मुद्दा भी शामिल किया जाए। परिवारों का कहना है कि केवल प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की चर्चा करने के बजाय उन पुलिसकर्मियों का मानवीय पक्ष भी देखा जाना चाहिए, जिन्हें कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए मैदान में तैनात किया जाता है और जो हिंसा के दौरान घायल होते हैं।
हिंसा भड़काने वालों की जवाबदेही तय करने की मांग
याचिका में पुलिस बल के खिलाफ हिंसा भड़काने या हमले में शामिल लोगों की जवाबदेही तय करने की मांग भी की गई है। परिवार चाहते हैं कि ऑन-ड्यूटी पुलिसकर्मियों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट राष्ट्रीय दिशानिर्देश तैयार हों। ऐसे में जंतर-मंतर हिंसा से जुड़ा मामला अब प्रदर्शनकारियों पर कथित बल प्रयोग के साथ पुलिसकर्मियों पर हुई कथित हिंसा के सवाल तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट के सामने अब दोनों पक्षों से जुड़े आरोप और अधिकारों का मुद्दा है, जिस पर आगे की सुनवाई अहम मानी जा रही है।