
दिवाली के त्योहार पर हर घर में पूजा के लिए खील, खिलौने, लइया और गट्टा जरूर लाया जाता है. जो कि हमारी परंपरा से जुड़ा है. वहीं इस मौके पर कुछ खास तरह के खिलौने भी बनाए जाते हैं, जो शक्कर से तैयार किए जाते हैं. ये मीठे खिलौने ना केवल देखने में खूबसूरत होते हैं बल्कि इनका स्वाद भी लाजवाब होता है. वहीं बात करें कानपुर की तो यहां पर इस तरह की मिठाइयों का एक थोक बाजार है. जहां पर कभी अंग्रेज अफसर भी शक्कर के खिलौने लेने पहुंचा करते थे. जी हां ये है 250 साल पुराने हुलागंज बाजार, जिसकी दिवाली के मौके पर रौनक देखते ही बनती है.
250 साल पुराने हुलागंज बाजार में छाई रौनक
कारोबारी साजन लाल दीक्षित का कहना है कि 250 साल पुराने हुलागंज बाजार में शक्कर से बने हाथी, घोड़े, चिड़िया को ज्यादा पसंद किया जाता है. यहां पर मिलने वाली मिठास कानपुर शहर ही नहीं बल्कि देशभर में धूम मचाती है. यहां पर करवा चौथ से ही कारोबारी खरीददारी के लिए पहुंचने लगते हैं. इस बाजार में मिलने वाला लइया, खील और चूरा भी काफी फेमस है. यहां तक की एक कहावत है जो हर किसी की जुबान पर रहती है- 'लइया बड़ी करारी है, लइया चुरमुर वाली है'.
यूपी के कई जिलों से दिवाली पर पहुंचते हैं कारोबारी
साजन लाल दीक्षित ने बताया कि इस बाजार में लइया, गट्टा, खील, खिलौने, चूरा किफायती और उचित दामों पर मिल जाता है. जाड़े में गजक, पट्टी और बाकी दिनों में रेवड़ी, पेठा भी तैयार किया जाता है. यहां पर खरीददारी के लिए गोरखपुर, बांदा, बस्ती, आगरा, बनारस सहित कई जिलों से कारोबारी पहुंचते हैं. इसके अलावा मध्य प्रदेश और बिहार में भी इसकी खूब डिमांड होती है.
लकड़ी के सांचे से तैयार होते हैं शक्कर के खिलौने
साजन लाल दीक्षित ने बताया कि यहां पर हथेली से भी छोटे आकार के शक्कर के खिलौने तैयार किए जाते हैं. इन खिलौनों को तैयार करने के लिए लकड़ी के सांचे का इस्तेमाल होता है. इनकी अलग-अलग तरह की डिजाइन होती है. इसमें हाथी, घोड़ा, पालकी, मटकी, सुराही, अलग-अलग तरह के जानवर और पक्षियों जैसी डिजाइन बनी होती है. इसे बनाने के लिए सबसे पहले धीमी आंच में शक्कर का तरल पदार्थ तैयार किया जाता है. फिर इन सांचो में डाल दिया जाता है. इसके बाद जब यह तैयार हो जाते हैं, तो दूर से ही देखने में आकर्षक लगते हैं. बच्चे हों या बड़े सब इन्हें खूब पसंद करते हैं.
मौजूदा समय की कहावत- 'लइया बड़ी करारी है, यह गट्टा कंपू वाला है'.
कारोबारी साजन लाल दीक्षित ने बताया कि दिवाली के त्योहार से कई दिन पहले से ही हुलागंज एक्सप्रेस रोड नयागंज से लेकर आसपास के सभी छोटे-छोटे मोहल्ले, चौराहों और बाजारों में लइया, खील की बिक्री शुरू हो जाती है. एक ऐसा समय भी था, जब हुलागंज में लइया का बड़े पैमाने पर व्यापार किया जाता था. मौजूदा समय में इसे लेकर एक कहावत कहीं जाने लगी है- 'लइया बड़ी करारी है, यह गट्टा कंपू वाला है'.
शक्कर वाले खिलौनों का रेट:
शक्कर वाले खिलौनों के दामों की बात करें तो पिछले साल की तुलना में इस बार कुछ खास बढ़ोतरी नहीं हुई है. इस बार इनका रेट थोक में 70 रुपए और फुटकर में 75 रुपए प्रति किलो है. दीपावली में आसपास के जिलों से फुटकर बिक्री करने वाले दुकानदार बाजार में खरीददारी करने के लिए आने लगे हैं. पिछले साल की अपेक्षा इस बार बाजार में अच्छी रौनक है. कारोबारियों को उम्मीद है, कि इस साल अच्छा व्यापार होगा.
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हुलागंज बाजार का इतिहास
कानपुर इतिहास समिति के महासचिव अनूप शुक्ल ने बताया कि ब्रिटिश काल में सर ह्यू व्हीलर के नाम पर इस मोहल्ले की पहचान व्हीलरगंज के नाम से हुआ करती थी. उन्हीं की स्मृति में इसका यह नाम भी पड़ा था. यहीं पास में ही अंग्रेजों की छावनी थी. अंग्रेज यहां पर खरीददारी करने के लिए आया करते थे. अंग्रेज अफसरों की शाही सवारी बाजार की रौनक बढ़ा देती थी. बाद में भारतीयों ने सेनापति हुलास सिंह के नाम पर इस बाजार का नाम हुलागंज रख दिया. तब से यह इसी नाम से जाना जाता है. यह बाजार घंटाघर चौराहे से आगे एक्सप्रेस रोड पर थोड़ा चलने के बाद दाईं तरफ है. पीढ़ी दर पीढ़ी यहां के कारखाना संचालक और दुकानदार मिठास घोलने का काम कर रहे हैं.