उत्तर प्रदेश में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे जातिगत राजनीति फिर से तेज होती दिख रही है। इस बार मामला सीधे बीजेपी के भीतर से उठा है, जहां कुर्मी और लोध समाज से जुड़े नेताओं के बीच टकराव सियासी बहस का केंद्र बन गया है। लखनऊ में हुए लोधी समाज के सम्मेलन ने यह साफ कर दिया कि पार्टी के अंदर जातिगत संतुलन को लेकर असंतोष बढ़ रहा है, जो आने वाले चुनावों में बीजेपी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है।
लोधी सम्मेलन से गया बड़ा संदेश
राजधानी लखनऊ में रविवार को लोधी समाज का बड़ा सम्मेलन हुआ, जिसमें सांसद, विधायक और मंत्री शामिल हुए। इस मंच के जरिए लोध समाज ने अपनी ताकत और नाराजगी दोनों जाहिर कर दी। यह सम्मेलन ऐसे वक्त हुआ, जब बीजेपी विधायक बृजभूषण राजपूत और योगी सरकार के मंत्री स्वतंत्र देव सिंह के बीच टकराव की चर्चा जोरों पर है। लोध समाज से आने वाले नेताओं की मौजूदगी को पार्टी पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
स्वतंत्र देव बनाम बृजभूषण से बढ़ा विवाद
योगी सरकार के जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और बीजेपी विधायक बृजभूषण राजपूत के बीच महोबा की घटना ने इस विवाद को हवा दी। जल जीवन मिशन के कामों को लेकर विधायक ने मंत्री का रास्ता रोका और आरोप लगाए। नल कनेक्शन, पाइपलाइन लीकेज और टंकी निर्माण जैसे मुद्दों पर दोनों के बीच तीखी नोक-झोंक हुई। यही टकराव अब कुर्मी बनाम लोध की सियासत में बदल गया है।
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पार्टी की कार्रवाई और अंदरूनी बेचैनी
इस मामले में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने बृजभूषण राजपूत को कारण बताओ नोटिस जारी किया। पार्टी ने साफ कहा कि यह अनुशासनहीनता है। जवाब संतोषजनक न होने पर कार्रवाई के संकेत भी दिए गए हैं। वहीं, विधायक के बचाव में उनके पिता और पूर्व सांसद गंगा चरण राजपूत सामने आए और बेटे को बुंदेलखंड के मुद्दों के लिए लड़ने वाला बताया। इससे विवाद और गहरा गया।
बीजेपी के दो बड़े वोट बैंक आमने-सामने
यूपी की राजनीति में कुर्मी और लोध दोनों ही बीजेपी के अहम वोट बैंक माने जाते हैं। लोध समाज कल्याण सिंह के दौर से पार्टी का परंपरागत आधार रहा है, जबकि कुर्मी समाज 2014 के बाद बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग की रीढ़ बना। लेकिन 2024 के चुनाव में कुर्मी वोटों में सेंध लगी और लोध वोटर भी पूरी तरह एकजुट नहीं दिखे। अब इन दोनों समाजों की नाराजगी बीजेपी के लिए बड़ी सियासी टेंशन बन रही है।
2027 की राह क्यों मुश्किल हो सकती है
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर कुर्मी बनाम लोध का यह विवाद जल्द नहीं सुलझा, तो 2027 में बीजेपी की राह और मुश्किल हो सकती है। लोध समाज पहले से संगठन और सरकार में बड़ी हिस्सेदारी की मांग कर रहा है। वहीं, कुर्मी समाज भी अपनी राजनीतिक ताकत दिखा चुका है। ऐसे में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इन दोनों बड़े ओबीसी वोट बैंकों के बीच संतुलन कैसे बनाए और सत्ता की हैट्रिक की राह को आसान करे।