देश में रसोई गैस की खपत में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ के ताजा आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 2026 में एलपीजी की खपत 16.16 प्रतिशत घटकर करीब 22 लाख टन रह गई। जबकि अप्रैल 2025 में यह 26.2 लाख टन थी। मासिक आधार पर भी गिरावट साफ दिखी, क्योंकि मार्च 2026 में खपत 23.79 लाख टन दर्ज की गई थी। इस अचानक आई कमी ने घरेलू ऊर्जा खपत के पैटर्न पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
सप्लाई पर असर और बदलती आदतें
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और समुद्री मार्गों में बाधा के कारण गैस की सप्लाई प्रभावित हुई है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से आने वाली खेपों में कमी आई है। इसका असर यह हुआ कि कई उपभोक्ता अब एलपीजी से हटकर पीएनजी और इंडक्शन जैसे विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं। शहरों में यह बदलाव तेजी से देखने को मिल रहा है, जहां लोग गैस सिलेंडर पर निर्भरता कम कर रहे हैं।
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भारत की आयात निर्भरता बनी वजह
भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है। इसमें सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों से आने वाली आपूर्ति अहम भूमिका निभाती है। लेकिन मौजूदा वैश्विक हालात ने इस सप्लाई चेन को प्रभावित कर दिया है। इसके चलते सरकार को घरेलू खपत को प्राथमिकता देते हुए वाणिज्यिक उपयोग में कटौती करनी पड़ी है। होटल और उद्योगों के लिए गैस की सप्लाई सीमित की गई है, जबकि घरेलू सिलेंडर की रिफिलिंग के बीच अंतराल भी बढ़ा दिया गया है।
अन्य ईंधनों पर भी दिखा असर
एलपीजी के साथ-साथ अन्य ईंधनों की खपत में भी बदलाव देखने को मिला है। विमानन ईंधन यानी एटीएफ की खपत अप्रैल में 1.37 प्रतिशत घटकर 7.61 लाख टन रह गई। वहीं डीजल की खपत में भी सुस्ती रही और यह मामूली बढ़त के साथ 82.82 लाख टन पर पहुंची। हालांकि पेट्रोल की मांग में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई, लेकिन इसकी रफ्तार भी पहले के मुकाबले धीमी रही।
सरकार के सामने नई चुनौती
सरकार पिछले कुछ वर्षों से स्वच्छ ईंधन के तौर पर एलपीजी को बढ़ावा दे रही थी और इसकी खपत लगातार बढ़ रही थी। लेकिन मौजूदा वैश्विक तनाव और सप्लाई में आई बाधाओं ने इस रफ्तार को झटका दिया है। अब चुनौती यह है कि घरेलू जरूरतों को पूरा करते हुए सप्लाई को कैसे संतुलित रखा जाए, ताकि आम लोगों पर इसका ज्यादा असर न पड़े।