
उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और उसकी नेता मायावती के इर्द-गिर्द चर्चा में रही है. कभी वह समय था जब मायावती सत्ता की कुर्सी पर बैठकर पूरे प्रदेश की राजनीति की धुरी हुआ करती थीं, लेकिन आज हालात बदल गए हैं. बसपा लगातार कमजोर हो रही है उसके नेता पार्टी छोड़ रहे हैं और चुनाव दर चुनाव उसका वोट बैंक सिकुड़ता जा रहा है. ऐसे में 2027 का विधानसभा चुनाव मायावती और बसपा के लिए "करो या मरो" की स्थिति बन गया है. यही वजह है कि मायावती ने अब "मिशन-2027" पर काम शुरू कर दिया है. इस मिशन का आगाज वह 9 अक्तूबर को करने जा रही हैं, जिस दिन बसपा संस्थापक कांशीराम का परिनिर्वाण दिवस है. लखनऊ में एक बड़ी जनसभा आयोजित होगी और इसी से बसपा की नई चुनावी रणनीति का एलान होगा.
बसपा का सबसे मुश्किल दौर
आज उत्तर प्रदेश की राजनीति बीजेपी और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच सीधे मुकाबले में सिमटती नजर आ रही है. कांग्रेस हाशिए पर है और बसपा भी लगातार कमजोर हो रही है. एक समय था जब बसपा यूपी में सत्ता की मजबूत दावेदार होती थी लेकिन अब उसकी ताकत इतनी घट गई है कि 2022 विधानसभा चुनाव में पार्टी केवल एक सीट जीत पाई. बसपा का वोट बैंक खासकर गैर-जाटव दलित वोटर और पिछड़ा वर्ग अब उससे दूरी बनाने लगे हैं. जाटव समाज पर मायावती की पकड़ तो अब भी बनी हुई है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए सिर्फ जाटव वोटर काफी नहीं हैं. यही मायावती की सबसे बड़ी चुनौती है.
मायावती का नया प्लान
मायावती इन दिनों लखनऊ में डेरा जमाए हुए हैं और लगातार पार्टी नेताओं से मुलाकात कर रही हैं. वह बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने में जुटी हैं. बसपा की रणनीति है कि पहले पंचायत चुनावों में मजबूत प्रदर्शन किया जाए और उसके बाद विधानसभा चुनाव के लिए आधार तैयार हो. इसके लिए पार्टी ने कई कमेटियां बनाई हैं जिनका काम है गांव-गांव जाकर बैठकें करना, दलितों के साथ पिछड़े वर्ग और मुसलमानों को जोड़ना, छोटे-छोटे जनसंवाद आयोजित कर बसपा की नीतियों को लोगों तक पहुंचाना और अन्य दलों के स्थानीय नेताओं को बसपा में शामिल कराना. बसपा का पूरा फोकस इस बार पंचायत चुनाव पर है. मायावती मानती हैं कि पंचायत चुनाव अगर बसपा अच्छे से लड़ेगी तो कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा और 2027 की राह आसान हो जाएगी.
'मिशन 9 अक्तूबर' का महत्व
9 अक्तूबर बसपा के लिए खास दिन है. इसी दिन 2006 में कांशीराम का निधन हुआ था. बसपा हर साल इस दिन को परिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाती है. लेकिन इस बार मायावती इसे "मिशन-2027" की शुरुआत के रूप में इस्तेमाल करने जा रही हैं. लखनऊ में होने वाली इस रैली को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं. मायावती चाहती हैं कि इस दिन बड़ी संख्या में समर्थक जुटें और विपक्षी दलों को यह संदेश मिले कि बसपा अभी भी मैदान में मौजूद है. माना जा रहा है कि इस जनसभा में मायावती अपनी चुनावी रणनीति का खाका पेश करेंगी और कार्यकर्ताओं को विपक्षी दलों के "झूठे प्रचार" का मुकाबला करने के लिए तैयार करेंगी.
मायावती का 'साइलेंट प्लान'
मायावती हमेशा से बिना ज्यादा प्रचार-प्रसार के अपनी रणनीतियों पर काम करती रही हैं. इस बार भी वही तरीका अपनाया गया है. वह शोर-शराबा नहीं कर रहीं लेकिन भीतर ही भीतर पूरी तैयारी चल रही है. उन्होंने पार्टी नेताओं को बूथ स्तर तक सक्रिय रहने के निर्देश दिए हैं. छोटे स्तर पर बैठकें की जा रही हैं ताकि लोगों से सीधा जुड़ाव बनाया जा सके. वहीं मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के नेताओं को बड़ी संख्या में शामिल किया जा रहा है और पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं को दोबारा सक्रिय करने की कोशिश हो रही है. बसपा का मानना है कि धीरे-धीरे यह मेहनत रंग लाएगी और 2027 तक एक मजबूत संगठन तैयार हो जाएगा.
पंचायत चुनाव बनेगा प्रयोगशाला
पंचायत चुनाव मायावती के लिए केवल ग्रामीण राजनीति नहीं, बल्कि "सियासी प्रयोगशाला" भी है. पार्टी का लक्ष्य है कि इन चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करके यह साबित किया जाए कि बसपा अभी खत्म नहीं हुई है. इस बार बसपा ने उम्मीदवारों के चयन में भी नई रणनीति अपनाई है. पार्टी ने सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए पिछड़े वर्ग और मुस्लिम समुदाय को बड़ी संख्या में टिकट देने का फैसला किया है. यह वही फार्मूला है जिसे 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने "सामाजिक इंजीनियरिंग" के नाम से आजमाया था. उस समय दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम समीकरण ने बसपा को बहुमत दिलाया था.
क्यों जरूरी है यह चुनाव मायावती के लिए?
बसपा का भविष्य इन पंचायत चुनावों और 2027 विधानसभा चुनाव से जुड़ा है. अगर बसपा पंचायत चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती है तो कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट जाएगा और विधानसभा चुनाव में चुनौती और बढ़ जाएगी. दूसरी ओर अगर पंचायत चुनावों में बसपा का प्रदर्शन अच्छा रहता है तो इसका असर सीधे विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा. लोग मायावती और उनकी पार्टी को फिर से एक विकल्प मानने लगेंगे.
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बसपा का कमजोर होता आधार
पिछले 15 सालों में बसपा का वोट बैंक लगातार घटा है. 2007 में जब मायावती पूर्ण बहुमत की सरकार लेकर आई थीं तब उनका वोट शेयर 30 फीसदी से ज्यादा था. लेकिन 2022 तक आते-आते यह घटकर लगभग 12 फीसदी रह गया. इस दौरान कई बड़े नेता बसपा छोड़कर अन्य दलों में चले गए. गैर-जाटव दलित भी मायावती से दूर हुए हैं. यह स्थिति मायावती के लिए बड़ी चिंता का विषय है.
क्या बसपा अकेले चुनाव जीत सकती है?
आज की राजनीति गठबंधनों की राजनीति है. बीजेपी ने एनडीए बनाया है और सपा "इंडिया ब्लॉक" के साथ खड़ी है. लेकिन मायावती किसी भी गठबंधन का हिस्सा बनने को तैयार नहीं हैं. वह बार-बार यह साफ कर चुकी हैं कि बसपा अपने दम पर ही चुनाव लड़ेगी. वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि अकेले चुनाव लड़कर मायावती बड़ी जीत हासिल नहीं कर पाएंगी. उन्हें किसी न किसी दल के साथ हाथ मिलाना पड़ेगा. लेकिन फिलहाल मायावती का इरादा साफ है. वह अपने दम पर ही राजनीतिक जमीन हासिल करना चाहती हैं.
2027: करो या मरो की लड़ाई
2027 का विधानसभा चुनाव मायावती के लिए अस्तित्व की लड़ाई से कम नहीं होगा. अगर इस बार भी बसपा खराब प्रदर्शन करती है, तो न केवल उसकी सत्ता में वापसी की उम्मीद खत्म होगी बल्कि राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी खतरे में पड़ सकता है. यही वजह है कि मायावती इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहतीं. पंचायत चुनावों से लेकर बूथ स्तर तक उनकी पूरी तैयारी चल रही है. उनका लक्ष्य है कि पार्टी का जनाधार फिर से मजबूत हो और बसपा को "तीसरे मोर्चे" के रूप में स्थापित किया जा सके.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती अभी भी एक बड़ा नाम हैं. लेकिन सच्चाई यह भी है कि उनकी पार्टी लगातार कमजोर हो रही है. अब 2027 ही तय करेगा कि मायावती और बसपा राजनीति में अपनी खोई हुई जमीन वापस पा पाते हैं या फिर यह दल इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाएगा. फिलहाल बसपा का पूरा फोकस 9 अक्तूबर से शुरू हो रहे "मिशन-2027" पर है. यह दिन तय करेगा कि मायावती का यह नया अभियान कार्यकर्ताओं और जनता को कितना उत्साहित कर पाता है.