मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उतार चढ़ाव देखने को मिला। एक दिन पहले तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर कई साल के उच्च स्तर के करीब पहुंच गई थीं। लेकिन अगले ही दिन बाजार का रुख बदल गया और दामों में तेज गिरावट दर्ज की गई। इस बदलाव से बाजार और कई देशों को राहत मिली है क्योंकि बढ़ती कीमतों को लेकर चिंता बढ़ने लगी थी।
रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंचा था तेल
सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत अचानक तेजी से बढ़ गई थी। कारोबार के दौरान यह करीब 117 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। यह स्तर साल 2022 के बाद पहली बार देखने को मिला था। मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव और समुद्री रास्तों को लेकर बनी अनिश्चितता की वजह से बाजार में घबराहट का माहौल बन गया था और इसी कारण कीमतों में उछाल आया था।
अगले दिन आई बड़ी गिरावट
मंगलवार की सुबह आते ही बाजार में तस्वीर बदल गई। कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेज गिरावट देखने को मिली। ब्रेंट क्रूड की कीमत गिरकर करीब 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई। यानी एक ही दिन में लगभग 10 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई। कीमतों में आई इस कमी से वैश्विक बाजार को थोड़ी राहत मिली और ऊर्जा से जुड़े क्षेत्रों में दबाव कम होता दिखाई दिया।
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अमेरिकी बयान से बदला माहौल
विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कीमतों में आई इस गिरावट के पीछे अमेरिका की राजनीति से जुड़ा एक बड़ा संकेत है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में संकेत दिया कि ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा तनाव जल्द कम हो सकता है। इस बयान के बाद बाजार में उम्मीद बढ़ी कि हालात धीरे धीरे सामान्य हो सकते हैं और इसी वजह से तेल की कीमतों में नरमी आई।
दूसरे तेल सूचकांक में भी गिरावट
कच्चे तेल के दूसरे बड़े सूचकांक वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट में भी इसी तरह की गिरावट देखने को मिली। इसकी कीमत भी करीब 10 प्रतिशत गिरकर लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई। इस दौरान यह खबर भी सामने आई कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ट्रंप के बीच फोन पर बातचीत हुई है। इसे भी तनाव कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
भारत में गैस सप्लाई को दी जा रही प्राथमिकता
इधर भारत में तेल कंपनियां घरेलू एलपीजी सप्लाई को प्राथमिकता देने की तैयारी कर रही हैं। भारत पेट्रोलियम ने बताया है कि घरों में गैस की कमी न हो इसके लिए उत्पादन बढ़ाया जा रहा है। अस्पताल, स्कूल और अन्य जरूरी संस्थानों को भी जरूरत के हिसाब से गैस उपलब्ध कराई जाएगी। साथ ही तेल कंपनियों की एक कमेटी बनाई गई है जो तय करेगी कि अलग अलग क्षेत्रों को कितनी एलपीजी दी जाए।