मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव ने भारत के व्यापार जगत की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हालिया हमलों के बाद पूरे क्षेत्र में हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। इस संघर्ष की गूंज भले ही हजारों किलोमीटर दूर सुनाई दे रही हो, लेकिन इसका असर भारत के व्यापार, उद्योग और आम लोगों की जेब तक पहुंचने की आशंका है। खाड़ी देश भारत के लिए न केवल बड़ा बाजार हैं, बल्कि वैश्विक व्यापार के लिए एक अहम मार्ग भी हैं। ऐसे में ऊर्जा, स्पेशलिटी केमिकल और रत्न-आभूषण जैसे क्षेत्रों की कंपनियों के सामने नई मुश्किलें खड़ी हो गई हैं।
बंदरगाहों और गोदामों में फंसा माल
तनाव के कारण हवाई और समुद्री यातायात पर असर पड़ा है, जिससे जहाजों की आवाजाही बाधित हो रही है। इसका नतीजा यह हुआ कि कई बंदरगाहों और गोदामों में माल अटक गया है। कंपनियों को भारी डेमरेज शुल्क भी चुकाना पड़ रहा है। इस स्थिति से परेशान भारतीय निर्यातक और आयातक अब कानूनी विशेषज्ञों की मदद ले रहे हैं ताकि अपने अनुबंधों में ‘फोर्स मेजर’ क्लॉज लागू कर सकें। कारोबारी अपनी सप्लाई चेन को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन युद्ध के हालात ने व्यापारिक ढांचे को झटका दिया है।
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178 अरब डॉलर के व्यापार पर संकट
खाड़ी सहयोग परिषद भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार समूह है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत और जीसीसी देशों के बीच करीब 178.56 अरब डॉलर का व्यापार हुआ, जो भारत के कुल वैश्विक व्यापार का लगभग 15.42 प्रतिशत है। भारत इस क्षेत्र में इंजीनियरिंग उत्पाद, चावल, कपड़े और आभूषण निर्यात करता है, जबकि वहां से कच्चा तेल, एलएनजी, पेट्रोकेमिकल और सोने जैसी कीमती धातुएं आयात की जाती हैं। मौजूदा हालात के कारण व्यापारियों के बीच डिलीवरी को लेकर भारी अनिश्चितता पैदा हो गई है।
पेट्रोल-डीजल और महंगाई पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संघर्ष लंबे समय तक चलता है तो भारत की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ सकता है। आपूर्ति बाधित होने से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तेजी आ सकती है और महंगाई बढ़ने का खतरा भी पैदा हो सकता है। हालांकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि दोनों पक्षों की सैन्य क्षमता में असंतुलन और क्षेत्रीय राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह संघर्ष लंबे समय तक नहीं चल सकता।
निर्यातकों में बढ़ी चिंता
इन हालातों के बीच निर्यातकों और लॉजिस्टिक से जुड़े कारोबारियों में डर का माहौल है। कई कंपनियां बीमा और कानूनी विशेषज्ञों से लगातार सलाह ले रही हैं ताकि शिपमेंट में देरी या रूट बदलने की स्थिति में होने वाले आर्थिक नुकसान से बचा जा सके। कारोबारियों का कहना है कि जब तक क्षेत्र में स्थिरता नहीं लौटती, तब तक व्यापारिक गतिविधियों पर अनिश्चितता का साया बना रहेगा।