मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध अब सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर कई जरूरी सेक्टर्स पर एक साथ दिखने लगा है। ऊर्जा संकट के साथ-साथ अब दवाओं, खाद और खाने-पीने की चीजों की कीमतों में भी तेजी देखने को मिल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह युद्ध लंबा खिंचा, तो हालात और गंभीर हो सकते हैं।
तेल और LPG से शुरू हुआ संकट
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने सबसे पहले तेल और गैस की सप्लाई को प्रभावित किया। होर्मुज स्ट्रेट जैसे अहम समुद्री मार्ग में रुकावट के कारण वैश्विक सप्लाई चेन टूट गई। कच्चे तेल की कीमत 113 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जिससे कई देशों में ईंधन संकट गहरा गया। भारत में भी एलपीजी की किल्लत ने आम लोगों की परेशानी बढ़ा दी है।
ये भी पढ़ें : युद्ध से मचा बाजार में महाक्रैश! 12 लाख करोड़ डूबे, निवेशकों में डर का माहौल गहराया
दवाओं पर बढ़ता दबाव
ऊर्जा संकट के साथ-साथ दवाओं की कीमतों पर भी असर दिखने लगा है। फार्मा इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है, जिसकी लागत बढ़ गई है। इसके अलावा पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले एल्युमिनियम और प्लास्टिक के महंगे होने से दवाओं की कीमतें भी बढ़ने लगी हैं। फिलहाल बाजार में स्टॉक मौजूद है, लेकिन आने वाले समय में कीमतों में और बढ़ोतरी संभव है।
खाद की सप्लाई पर खतरा
इस युद्ध का असर फर्टिलाइजर सेक्टर पर भी गहराता दिख रहा है। प्राकृतिक गैस पर निर्भर उर्वरक उत्पादन प्रभावित हो रहा है, जिससे खाद की कमी के संकेत मिल रहे हैं। कई देशों में फर्टिलाइजर प्लांट बंद होने की कगार पर हैं। ऐसे में किसानों के लिए बुवाई का समय चुनौतीपूर्ण हो सकता है और इसका असर कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है।
खाने-पीने की चीजें भी महंगी
खाद की कमी और बढ़ती लागत का असर सीधे खाद्य पदार्थों पर पड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया के बड़े हिस्से में फसल उत्पादन फर्टिलाइजर पर निर्भर है, ऐसे में सप्लाई में रुकावट से खाने-पीने की चीजों के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं। पहले से ही तेल-गैस संकट के कारण होटल और रेस्टोरेंट बिजनेस प्रभावित हो रहा है, जिससे आम आदमी की जेब पर दोहरी मार पड़ रही है।