मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी हमलों से हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। इस टकराव का सीधा असर ऊर्जा बाजार पर दिख रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर नई आशंकाएं पैदा कर दी हैं।
तेल की कीमतों में उछाल
संघर्ष की खबरों के बीच कच्चे तेल के दाम में एक ही दिन में करीब 13 प्रतिशत तक की तेजी देखी गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो दाम 100 डॉलर तक जा सकते हैं, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहेगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य की अहमियत
तेल बाजार में उथल-पुथल की बड़ी वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है। यह समुद्री रास्ता दुनिया के लिए बेहद अहम है। वैश्विक कच्चे तेल का लगभग 40 प्रतिशत और गैस का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। अगर यहां सप्लाई बाधित होती है तो कई देशों की ऊर्जा जरूरतें प्रभावित हो सकती हैं।
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भारत के पास मजबूत तैयारी
हालांकि भारत को फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक देश के पास पर्याप्त रणनीतिक भंडार मौजूद है। यह भंडार अल्पकालिक आपूर्ति रुकावट की स्थिति में काम आ सकता है। कच्चे तेल का भंडार लगभग 45 दिनों तक घरेलू जरूरतें पूरी करने में सक्षम बताया जा रहा है।
गैस और अन्य ऊर्जा का स्टॉक
रणनीतिक भंडार एलपीजी और एलएनजी की मांग को भी कुछ समय तक पूरा कर सकते हैं। अधिकारियों का कहना है कि अगर लंबे समय तक आपूर्ति प्रभावित होती है तो भारत वैकल्पिक बाजारों से तेल और गैस खरीदने की क्षमता रखता है। फिलहाल तत्काल भौतिक कमी की आशंका कम मानी जा रही है।
यूरोप में भी बढ़ी कीमतें
मिडिल ईस्ट के तनाव का असर यूरोप पर भी दिख रहा है। वहां प्राकृतिक गैस की कीमतों में लगभग 22 प्रतिशत की तेजी आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समुद्री रास्तों में बाधा आती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर व्यापक असर पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में हालात पर नजर रखना जरूरी होगा।