नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद की एक रैली में देशवासियों से एक साल तक सोना खरीदने से बचने की अपील कर नई बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि देशभक्ति सिर्फ सीमा पर लड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक चुनौतियों के समय जिम्मेदार फैसले लेना भी उतना ही जरूरी है। उनकी यह अपील ऐसे समय आई है जब वैश्विक तनाव, महंगे कच्चे तेल और कमजोर रुपये ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है।
भारत पर क्यों भारी पड़ता है सोना
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गोल्ड उपभोक्ता देश माना जाता है। देश में हर साल करीब 700 से 800 टन सोने की मांग होती है, लेकिन घरेलू उत्पादन बेहद कम है। यही वजह है कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत सोना आयात करता है। चूंकि इसका भुगतान डॉलर में होता है, इसलिए बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा देश से बाहर चली जाती है।
72 अरब डॉलर का बड़ा दबाव
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का सोना आयात करीब 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले साल की तुलना में काफी ज्यादा है। वहीं भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी हाल के महीनों में घटा है। Reserve Bank of India के आंकड़ों के अनुसार विदेशी मुद्रा भंडार फरवरी में 728 अरब डॉलर तक पहुंचा था, लेकिन बाद में घटकर करीब 691 अरब डॉलर रह गया।
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सरकार किस खतरे को लेकर सतर्क
International Monetary Fund के अनुमान के मुताबिक भारत का चालू खाता घाटा 2026 में बढ़कर 84.5 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इसका मतलब है कि देश से बाहर जाने वाले डॉलर, देश में आने वाले डॉलर से ज्यादा हो सकते हैं। ऐसे में सरकार हर उस खर्च को कम करना चाहती है, जिससे विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ता हो।
एक साल सोना न खरीदने से क्या बदलेगा
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर देश में सोने की खरीद में 30 से 40 प्रतिशत की कमी आती है, तो भारत करीब 20 से 25 अरब डॉलर तक बचा सकता है। वहीं अगर आयात आधा रह जाए तो लगभग 36 अरब डॉलर की बचत संभव है। इससे चालू खाता घाटा कम करने और रुपये को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है। यही वजह है कि पीएम मोदी की यह अपील सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि एक बड़े आर्थिक रणनीतिक संदेश के तौर पर देखी जा रही है।