दिल्ली के हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन की मुलाकात दुनिया के लिए बड़ा संदेश बन गई। इस वक्त जब दुनिया दो ध्रुवों में बंटी दिख रही है, भारत और रूस का साथ आना कई देशों के लिए चिंता का कारण है। चार साल बाद पुतिन की भारत यात्रा ने साफ कर दिया कि दोनों देश अपनी पुरानी साझेदारी को नए दौर में और मजबूत करना चाहते हैं। अमेरिकी दबाव, तेल पर खींचतान और वैश्विक राजनीति के तनाव के बीच भारत और रूस का खुलकर साथ दिखाना कई देशों की रणनीति को चुनौती देता दिख रहा है।
आर्थिक और कनेक्टिविटी समझौतों ने बदली तस्वीर
इस मुलाकात की सबसे बड़ी उपलब्धि 2030 तक का नया आर्थिक सहयोग कार्यक्रम रहा। इसका लक्ष्य व्यापार बढ़ाना, निवेश संतुलित करना और रुपये–रूबल ट्रेड को नए स्तर तक ले जाना है। इसे डॉलर-केंद्रित आर्थिक ढांचे के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। इसके साथ ही चेन्नई–व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर, नॉर्दर्न सी रूट और आईएनएसटीसी जैसे समुद्री मार्गों को तेज गति देने का फैसला हुआ। इससे एशिया–यूरोप के बीच भारत की पकड़ मजबूत होगी, व्यापार तेज होगा और शिपबिल्डिंग में संयुक्त परियोजनाओं से रोजगार और स्किलिंग को सीधा लाभ मिलेगा।
ऊर्जा, परमाणु और शिक्षा से जुड़े बड़े फैसले
ऊर्जा सुरक्षा इस दौरे का दूसरा बड़ा स्तंभ रहा। भारत–रूस न्यूक्लियर सहयोग को आगे बढ़ाने के साथ महत्वपूर्ण खनिजों पर भी साझेदारी को मजबूत करने का निर्णय लिया गया, जो भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा और हाई-टेक उद्योग के लिए बेहद अहम है। दोनों देशों ने मानव संसाधन और शिक्षा से जुड़े कई समझौते भी किए। रूस के लिए 30 दिन का मुफ्त ई-टूरिस्ट वीजा शुरू करने का एलान दोनों देशों के लोगों के बीच आवागमन को आसान बनाएगा। रूस में दो नए भारतीय कॉन्सुलेट खोलने से कारोबार, शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की रफ्तार और बढ़ेगी।
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सुरक्षा मुद्दों पर एकजुटता और दुनिया को कड़ा संदेश
सुरक्षा और आतंकवाद पर भारत–रूस की एक जैसी राय ने इस मुलाकात को और मजबूत बना दिया। पीएम मोदी ने कहा कि भारत का पक्ष हमेशा शांति का है, और दुनिया को स्थिरता की ओर ले जाने वाले हर प्रयास का समर्थन किया जाएगा। पुतिन ने भी भरोसा जताया कि दोनों देशों की एकजुटता अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अहम भूमिका निभाती है। यूरोप में तनाव, एशिया में नए सुरक्षा सवाल और वैश्विक आर्थिक खींचतान के बीच भारत–रूस का साथ खड़े होना कई देशों के लिए बड़ा संकेत है। यही वजह है कि इस दौरे को ‘गेमचेंजर’ कहा जा रहा है, जिसने पश्चिमी देशों में हलचल बढ़ा दी है और भारत–रूस के रिश्तों को नई मजबूती दे दी है।