
Dularchand Yadav death: बिहार का मोकामा इलाका दशकों से बाहुबली राजनीति का केंद्र माना जाता रहा है। यह सीट लंबे समय तक अनंत सिंह जैसे नेताओं के प्रभाव में रही है, जो इस बार NDA गठबंधन के उम्मीदवार हैं। लेकिन जन सुराज पार्टी के नेता दुलारचंद यादव की हत्या ने यहां के राजनीतिक समीकरणों को झकझोर दिया है। यह घटना न केवल एक आपराधिक वारदात मानी जा रही है, बल्कि जातीय और राजनीतिक ध्रुवीकरण की नई शुरुआत के रूप में भी देखी जा रही है। विधानसभा चुनाव से पहले मोकामा का सियासी माहौल फिर से गरम हो गया है और सबकी नज़रें इस सीट पर टिक गई हैं।
जातीय संतुलन पर बड़ा असर
कभी लालू प्रसाद यादव के करीबी रहे दुलारचंद यादव का राजनीतिक सफर कई दलों से जुड़ा रहा, लेकिन उनकी हत्या ने यादव और भूमिहार समुदाय के बीच पुराने समीकरणों को हिला दिया है। कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह का कहना है कि मोकामा की राजनीति पर भूमिहार जाति का दबदबा रहा है, जिसने यादव बहुल क्षेत्र में भी अपना वर्चस्व बनाए रखा था। अब दुलारचंद की हत्या के बाद यादव समाज में नई एकजुटता दिख रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटना का असर न सिर्फ मोकामा बल्कि आस-पास की सीटों तक पहुंचेगा और यह जातीय संतुलन को फिर से परिभाषित कर सकता है।
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नए समीकरणों की शुरुआत
जेडीयू नेता नीरज कुमार के अनुसार, अब यादव और धानुक समुदाय का गठजोड़ मोकामा की पारंपरिक राजनीति को चुनौती दे रहा है। जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी, जो धानुक समाज से हैं, धीरे-धीरे इस क्षेत्र में नया वोट बैंक तैयार कर रहे हैं। वहीं भूमिहार समाज, जो करीब 30 प्रतिशत आबादी के साथ यहां सबसे प्रभावशाली है, एक बार फिर एकजुट होकर अपने प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश में है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि दुलारचंद हत्याकांड ने 1990 के दशक जैसी जातीय गोलबंदी की याद ताज़ा कर दी है — जिससे मोकामा की सियासत एक बार फिर उबाल पर है।