Nana Patekar Life Journey : नाना पाटेकर का बचपन बाकी बच्चों की तरह आसान नहीं था। परिवार की आर्थिक हालत खराब होने के बाद उन्हें बहुत छोटी उम्र में ही काम करना पड़ा। करीब 13 साल की उम्र में उन्होंने फिल्मों के पोस्टर पेंट करने का काम शुरू किया। इसके लिए उन्हें महीने के सिर्फ 35 रुपये मिलते थे। स्कूल के बाद वह कई किलोमीटर पैदल चलकर काम पर जाते थे। इस उम्र में जहां बच्चे खेलते और पढ़ाई करते थे, वहीं नाना अपने परिवार की मदद के लिए मेहनत कर रहे थे।
पोस्टर बनाने से मिली मेहनत की सीख
नाना ने अपने शुरुआती दिनों में सिर्फ पोस्टर ही नहीं बनाए, बल्कि सड़क पर जेब्रा क्रॉसिंग पेंट करने का काम भी किया। पैसों की कमी इतनी थी कि छोटी-सी कमाई भी परिवार के लिए बहुत मायने रखती थी। इन मुश्किल दिनों ने नाना को मेहनत और जिम्मेदारी का मतलब बहुत कम उम्र में समझा दिया। बाद में उन्होंने खुद बताया कि उस दौर के अनुभवों ने उन्हें जिंदगी को करीब से समझने का मौका दिया।
पढ़ाई के साथ अभिनय का जुनून
मुश्किल हालात के बावजूद नाना ने पढ़ाई नहीं छोड़ी। उन्होंने कला की पढ़ाई की और जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से जुड़े। इसी दौरान उनका झुकाव अभिनय और रंगमंच की तरफ बढ़ता गया। थिएटर ने उन्हें अपनी आवाज, हावभाव और किरदार को समझने का मौका दिया। धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि अभिनय सिर्फ शौक नहीं, बल्कि वह काम है जिसमें वह खुद को पूरी तरह देख सकते हैं।
बड़े पर्दे पर पहचान बनाने में लगा वक्त
नाना पाटेकर ने 1978 में फिल्म गमन से बड़े पर्दे पर कदम रखा, लेकिन उन्हें तुरंत बड़ी पहचान नहीं मिली। कई सालों तक उन्होंने छोटे और सहायक किरदार किए। फिर परिंदा और क्रांतिवीर जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय की ताकत को लोगों तक पहुंचाया। उनकी दमदार आवाज, चेहरे के भाव और किरदार को जीने का तरीका दर्शकों को अलग नजर आया। आगे चलकर वेलकम जैसी फिल्म में उनका हास्य अंदाज भी खूब पसंद किया गया।
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35 रुपये से राष्ट्रीय पुरस्कार तक का सफर
नाना पाटेकर का सफर सिर्फ गरीबी से निकलकर अभिनेता बनने की कहानी नहीं है। उन्होंने अभिनय के साथ निर्देशन और रंगमंच में भी अपनी पहचान बनाई। परिंदा, क्रांतिवीर और अग्निसाक्षी जैसी फिल्मों के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। साल 2013 में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। आज नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी जिंदगी की कहानी यह बताती है कि शुरुआत कितनी भी मुश्किल क्यों न हो, लगातार मेहनत इंसान को बहुत आगे ले जा सकती है। 35 रुपये की छोटी-सी नौकरी से शुरू हुआ उनका सफर भारतीय सिनेमा के यादगार कलाकारों तक पहुंचा और यही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई।