केंद्र सरकार ने मंगलवार को NEET PG 2025 के लिए क्वालिफाइंग कटऑफ में बड़ी कटौती कर दी। सरकार का तर्क है कि देशभर के मेडिकल कॉलेजों में बड़ी संख्या में पीजी सीटें खाली पड़ी हैं और उन्हें भरना जरूरी है। लेकिन जैसे ही नई कटऑफ सामने आई, विवाद शुरू हो गया। लोगों का कहना है कि जिस पेशे में सीधे मरीजों की जान जुड़ी हो, वहां योग्यता का स्तर इतना नीचे लाना ठीक नहीं है।
क्यों लिया गया यह फैसला
नीट पीजी काउंसलिंग के दूसरे राउंड के बाद भी कई राज्यों, सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में सीटें खाली रह गईं। सरकार और परीक्षा एजेंसी का मानना है कि उपलब्ध सीटों का सही इस्तेमाल होना चाहिए। इसी वजह से 2025–26 शैक्षणिक सत्र के लिए तीसरे राउंड की काउंसलिंग से पहले कटऑफ घटाने का फैसला लिया गया, ताकि ज्यादा से ज्यादा उम्मीदवारों को मौका मिल सके।
कब और कैसे बदली गई कटऑफ
नीट पीजी 2025 का रिजल्ट 19 अगस्त 2025 को घोषित हुआ था। इसके बाद 9 जनवरी 2026 को स्वास्थ्य मंत्रालय ने न्यूनतम क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल घटाने की मंजूरी दी। इसके बाद नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेज ने आधिकारिक तौर पर नई कटऑफ जारी कर दी। यह नियम केवल तीसरे राउंड की काउंसलिंग पर लागू होगा।
नई कटऑफ क्या तय की गई
नई व्यवस्था के तहत सामान्य और ईडब्ल्यूएस वर्ग के लिए कटऑफ 50 से घटाकर 7 पर्सेंटाइल कर दी गई है। दिव्यांग सामान्य वर्ग के लिए यह 45 से घटाकर 5 पर्सेंटाइल की गई है। वहीं अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए कटऑफ 40 से घटाकर 0 पर्सेंटाइल कर दी गई है। इसका मतलब है कि नेगेटिव मार्किंग के कारण 800 में से माइनस 40 अंक पाने वाले उम्मीदवार भी पात्र माने जाएंगे।
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क्या माइनस 40 वालों को सच में एडमिशन मिलेगा
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है। विशेषज्ञ बताते हैं कि कटऑफ घटने का मतलब यह नहीं कि हर उम्मीदवार को मनपसंद कॉलेज और विषय मिल जाएगा। आमतौर पर ये वो सीटें होती हैं, जिनमें रुचि कम होती है या जो दूर-दराज के कॉलेजों में होती हैं। ऐसे में कम अंक वाले उम्मीदवारों को भी वहां दाखिला मिल सकता है, ताकि सीटें खाली न रहें।
पहले भी हो चुका है ऐसा
यह पहली बार नहीं है जब कटऑफ इतनी नीचे लाई गई हो। पिछले साल भी काउंसलिंग के दौरान कटऑफ 5 पर्सेंटाइल तक घटाई गई थी। फर्क बस इतना है कि इस बार सीटों की संख्या ज्यादा होने के कारण कटऑफ को 0 तक लाना पड़ा। सरकार का कहना है कि एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर चुके उम्मीदवार पहले ही डॉक्टर होते हैं, और पीजी में यह बदलाव सिर्फ खाली सीटें भरने के लिए किया गया है।