
नेपाल में बीते कई हफ्तों से जारी Gen-Z आंदोलन अब लगभग थम गया है। कुछ इलाकों से गुरुवार को उपद्रव की खबरें जरूर सामने आईं मगर अब देश के सामने असली चुनौती नई सरकार के गठन की है। आंदोलनकारियों ने अपनी मांगों का एक ड्राफ्ट जारी कर दिया है, जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि उनकी लड़ाई विनाश के लिए नहीं, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता के लिए है।
संसद भंग और अंतरिम सरकार की मांग
Gen-Z समूह द्वारा सबसे पहले संसद को भंग करने की मांग रखी है। युवाओं का कहना है कि राष्ट्रपति के औपचारिक नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार बने, जिसका नाम संयुक्त नागरिक-सैन्य संकट प्रबंधन परिषद रखा जाए। इसके कार्यकारी प्रमुख के तौर पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को नियुक्त करने का प्रस्ताव दिया गया है। साथ ही इसमें जस्टिस आनंद मोहन भट्टाराई और नेपाली सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को भी शामिल करने की मांग की गई है। इस अंतरिम सरकार का मकसद लंबे समय तक शासन करना नहीं होगा, बल्कि 6 से 12 महीने के भीतर लोकतांत्रिक आम चुनाव कराना होगा। युवाओं ने साफ कहा कि सेना की भूमिका सिर्फ सुरक्षा, स्थिरता और निगरानी तक सीमित रहनी चाहिए।
भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग पर सख्ती
युवाओं के मुताबिक अब तक की राजनीति भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग से ग्रस्त रही है। इसलिए एक स्वतंत्र न्यायिक आयोग बनाया जाए, जो नेताओं, नौकरशाहों और प्रशासनिक अधिकारियों की संपत्ति और कामकाज की जांच करे। आंदोलनकारियों ने यह भी कहा कि युवाओं पर गोली चलाने वाले अधिकारियों को सजा मिलनी चाहिए और ऐसे सभी दमनकारी कदमों की जांच की जानी चाहिए।
ये भी पढ़ें : नेपाल में तख्तापलट के बाद केपी शर्मा ओली का पहला खुला पत्र: भारत विरोधी तेवर के साथ जताई पीड़ा और अपनी लोकेशन
हिंसा की निंदा और जिम्मेदारों की पहचान
मांग पत्र में साफ लिखा गया है कि आंदोलन जवाबदेही और न्याय के लिए था, ना कि हिंसा के लिए। आगजनी, लूटपाट और सरकारी दफ्तरों में तोड़फोड़ जैसे कृत्यों की युवाओं ने निंदा की है। उनका कहना है कि यह सब उनके आंदोलन की गरिमा पर हमला है और इसमें शामिल लोगों, चाहे वे घुसपैठिए हों या भड़काने वाले उनकी पहचान कर उन्हें न्याय के कटघरे में लाया जाए।
पीड़ितों को मुआवजा और सुरक्षा की मांग
Gen-Z ने मांग की है कि आंदोलन के दौरान जिन परिवारों को जान-माल का नुकसान हुआ है, उन्हें तुरंत मुआवजा दिया जाए। अस्पतालों, स्कूलों और अहम सरकारी ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। इसके अलावा, यदि सिविल सोसायटी पीड़ितों की मदद के लिए फंड जुटाए तो उसका वितरण सेना के सहयोग से ही हो।
नेताओं को भागने से रोकने पर जोर
युवाओं ने चेतावनी दी है कि वर्तमान में सैन्य संरक्षण में रह रहे राजनेताओं को जवाबदेही से बचने या देश छोड़ने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। सभी आरोपियों के खिलाफ निष्पक्ष जांच कर मुकदमा चलाया जाए। वहीं जेल या पुलिस हिरासत से भागे हुए कैदियों को भी कानूनी प्रक्रिया से वापस लाकर हिरासत में लिया जाए।
इस तरह, आंदोलनकारी युवाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी लड़ाई किसी तख्तापलट या अराजकता के लिए नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार मुक्त शासन, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक चुनावों की बहाली के लिए है। अब सवाल ये खड़ा होता है कि नेपाल की सत्ता और संस्थाएं इन मांगों को किस हद तक मानती हैं और देश को स्थिर लोकतांत्रिक राह पर कैसे आगे बढ़ाती हैं।