New Crisis For Uddhav Faction: शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) को लोकसभा सांसदों की बगावत के बाद एक और बड़ा राजनीतिक झटका लग सकता है। पार्टी के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट में शामिल होने के बाद संसद में उद्धव गुट की संख्या घटकर चार सांसदों तक सीमित होने की संभावना है। ऐसे में संसद भवन परिसर में पार्टी को मिला कार्यालय भी खतरे में पड़ सकता है, क्योंकि आमतौर पर पांच या उससे अधिक सांसदों वाले दलों को ही संसदीय कार्यालय आवंटित किया जाता है।
सांसदों की संख्या घटने से बढ़ी चिंता
छह सांसदों के शिंदे गुट में जाने के बाद उद्धव गुट की संसदीय ताकत काफी कम हो गई है। लोकसभा अध्यक्ष की औपचारिक मंजूरी मिलने के बाद पार्टी के पास केवल चार सांसद बचेंगे। संसदीय नियमों के तहत कम सदस्य संख्या वाले दलों को कई सुविधाओं में कटौती का सामना करना पड़ सकता है, जिससे पार्टी की संसदीय गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
सर्वदलीय बैठकों में भागीदारी पर सवाल
सांसदों की संख्या कम होने का असर केवल कार्यालय तक सीमित नहीं रह सकता। महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और संसदीय मुद्दों पर बुलाई जाने वाली सर्वदलीय बैठकों में भी उद्धव गुट की भागीदारी प्रभावित हो सकती है। सामान्य तौर पर ऐसी बैठकों में उन्हीं दलों को प्राथमिकता दी जाती है जिनके पास न्यूनतम निर्धारित संख्या में सांसद होते हैं। ऐसे में पार्टी की राजनीतिक उपस्थिति और प्रभाव पर भी असर पड़ सकता है।
लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात पर टिकी नजरें
इस बीच लोकसभा अध्यक्ष ने पार्टी के वरिष्ठ सांसद अरविंद सावंत और अनिल देसाई को बैठक के लिए आमंत्रित किया है। उद्धव गुट ने पहले ही अध्यक्ष को पत्र लिखकर दल बदलने वाले सांसदों को मान्यता न देने की मांग की थी। अब इस मुलाकात के बाद होने वाले निर्णय पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इससे पार्टी की संसदीय स्थिति पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।
बागी सांसदों ने फैसले का किया बचाव
उधर शिंदे गुट में शामिल हुए सांसदों ने अपने फैसले को सही ठहराया है। शिरडी से सांसद भाऊसाहेब ने कहा कि उन्होंने अपने क्षेत्र के विकास को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया है। उन्होंने दावा किया कि उनके निर्वाचन क्षेत्र में लोगों और कार्यकर्ताओं का उन्हें समर्थन मिल रहा है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वे जल्द ही अपने क्षेत्र का दौरा करेंगे और जनता के बीच जाकर अपने फैसले की वजह बताएंगे।