भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुए नए मुक्त व्यापार समझौते को लेकर वहां की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। न्यूजीलैंड के विदेश मंत्री विंस्टन पीटर्स ने इस समझौते को साफ तौर पर बुरा सौदा बताया है। उनका कहना है कि इसमें न्यूजीलैंड ने बहुत कुछ दे दिया, लेकिन बदले में उसे अपेक्षित फायदे नहीं मिले। पीटर्स की पार्टी न्यूजीलैंड फर्स्ट इस समझौते के खिलाफ खड़ी हो गई है और संसद में इसके कानून बनने के विरोध में वोट करने का ऐलान कर चुकी है। इससे सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं।
जल्दबाजी में हुआ कमजोर समझौता
पीटर्स ने आरोप लगाया कि गठबंधन सहयोगी नेशनल पार्टी ने इस समझौते को जल्दी पूरा करने के चक्कर में गुणवत्ता से समझौता किया। उनके मुताबिक, न्यूजीलैंड फर्स्ट चाहती थी कि सरकार तीन साल तक बातचीत कर बेहतर शर्तें तय करे। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। उनका कहना है कि यह न तो मुक्त है और न ही निष्पक्ष समझौता है। पीटर्स ने यह भी कहा कि नेशनल पार्टी ने दोनों देशों के लोगों के लिए फायदेमंद और संतुलित समझौता करने के बजाय जल्दबाजी में कम गुणवत्ता वाला सौदा कर लिया।
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डेयरी सेक्टर बना सबसे बड़ी चिंता
इस समझौते को लेकर पीटर्स की सबसे बड़ी नाराजगी डेयरी सेक्टर को लेकर है। डेयरी न्यूजीलैंड की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है, लेकिन इस समझौते में भारत ने दूध, पनीर और मक्खन जैसे उत्पादों पर टैरिफ बनाए रखे हैं। वहीं न्यूजीलैंड अपने बाजार भारतीय उत्पादों के लिए खोल देगा। पीटर्स का कहना है कि यह किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए नुकसानदेह है। उन्होंने इसे न्यूजीलैंड का पहला ऐसा व्यापार समझौता बताया, जिसमें उसके प्रमुख डेयरी उत्पाद शामिल ही नहीं हैं।
प्रवासन और रोजगार पर भी सवाल
व्यापार के अलावा पीटर्स ने अप्रवासन और मजदूरों की आवाजाही से जुड़ी रियायतों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इस समझौते के तहत भारतीय नागरिकों को न्यूजीलैंड के मजदूर बाजार में ज्यादा पहुंच दी जा रही है, जो मौजूदा हालात में अविवेकपूर्ण है। उन्होंने नए रोजगार वीजा और छात्रों के काम करने के अधिकार बढ़ाने पर भी चिंता जताई। पीटर्स के मुताबिक, इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का दबाव और बढ़ सकता है। अब जब उनकी पार्टी ने कानून का विरोध तय कर लिया है, तो संसद में इस FTA का भविष्य अनिश्चित नजर आ रहा है।