नोएडा में इन दिनों जो तस्वीर सामने आ रही है, वह हैरान करने वाली है। बीए, बीकॉम और बीटेक जैसी डिग्री रखने वाले युवा आज 10-12 हजार रुपये की नौकरी करने को मजबूर हैं। हालात इतने खराब हैं कि अब ये युवा सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं।
डिग्री है, लेकिन नौकरी नहीं
‘इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026’ के अनुसार आर्ट्स ग्रेजुएट्स की रोजगार क्षमता सिर्फ 55.5% है। यानी आधे से ज्यादा छात्र डिग्री के बावजूद कंपनियों की जरूरतों पर खरे नहीं उतर पा रहे। वहीं ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026’ बताती है कि 25 साल तक के 40% ग्रेजुएट्स बेरोजगार हैं या अपनी योग्यता से कम स्तर का काम कर रहे हैं।
कंपनियां क्यों देती हैं कम सैलरी
जब छात्रों के पास केवल थ्योरी होती है और प्रैक्टिकल स्किल्स की कमी होती है, तो कंपनियां उन्हें ‘ट्रेनिंग मटेरियल’ मानती हैं। कंपनियों का तर्क है कि उन्हें नए सिरे से ट्रेन करना पड़ता है, इसलिए वे कम सैलरी देती हैं। यही वजह है कि युवा मजबूरी में कम पैसों पर काम करने को तैयार हो जाते हैं।
शोषण का बनता चक्र
स्किल की कमी के कारण युवाओं के पास मोलभाव करने की ताकत नहीं होती। वे 10 हजार की नौकरी भी इसलिए स्वीकार करते हैं क्योंकि उनके पास कोई खास स्किल नहीं होती। इससे कंपनियों को सस्ती मजदूरी मिलती है और यह चक्र लगातार चलता रहता है।
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शिक्षा प्रणाली पर सवाल
नोएडा का यह आंदोलन सीधे तौर पर हमारे शिक्षा मॉडल पर सवाल खड़ा करता है। आज भी कॉलेजों में थ्योरी पर ज्यादा जोर दिया जाता है, जबकि इंडस्ट्री को प्रैक्टिकल स्किल्स चाहिए। यही कारण है कि डिग्री होने के बावजूद युवा ‘जॉब रेडी’ नहीं बन पा रहे।
स्किल बेस्ड लर्निंग की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है कि पढ़ाई को मार्क्स से हटाकर स्किल पर फोकस किया जाए। इंटर्नशिप, वोकेशनल ट्रेनिंग और इंडस्ट्री एक्सपोजर को शिक्षा का हिस्सा बनाना जरूरी है। सरकार भी नई शिक्षा नीति के तहत स्किल डेवलपमेंट पर जोर दे रही है।
छात्रों के लिए क्या रास्ता
आज के दौर में केवल डिग्री से काम नहीं चलेगा। एआई, डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल मार्केटिंग और कोडिंग जैसी स्किल्स सीखना जरूरी हो गया है। ये स्किल्स किसी भी युवा की सैलरी को कई गुना बढ़ा सकती हैं।
मूल समस्या अब भी बरकरार
हालांकि स्किल सीखना जरूरी है, लेकिन नोएडा में हो रहे प्रदर्शन यह भी दिखाते हैं कि कंपनियां कर्मचारियों को बुनियादी अधिकार नहीं दे रही हैं। कम सैलरी, लंबा काम और सुविधाओं की कमी ने युवाओं को सड़क पर उतरने पर मजबूर कर दिया है। अब सवाल यही है कि बदलाव कौन लाएगा।