Election Commissioner Gyanesh Kumar: भारत की चुनाव व्यवस्था में चुनाव आयोग की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों ने संसद के दोनों सदनों में महाभियोग का नोटिस दिया है। तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में कई विपक्षी दलों ने यह कदम उठाया है और उन पर चुनावी प्रक्रियाओं को सही तरीके से न संभालने सहित कई गंभीर आरोप लगाए हैं। अब इस मामले में आगे की कार्रवाई का फैसला लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा के सभापति को करना है।
नियमों से ज्यादा समर्थन
सूत्रों के अनुसार लोकसभा में करीब 130 सांसदों और राज्यसभा में 63 सांसदों ने इस महाभियोग नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं। संसद के नियमों के मुताबिक लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। इस लिहाज से विपक्ष ने आवश्यक संख्या से अधिक सांसदों का समर्थन जुटा लिया है, जिससे यह मुद्दा अब औपचारिक रूप से संसद के सामने आ गया है।
तीन मुख्य आरोप
विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सात बिंदुओं का आरोप पत्र तैयार किया है। इसमें खास तौर पर तीन बड़े मुद्दे उठाए गए हैं। पहला आरोप बिहार में चुनाव से जुड़े SIR से जुड़ी स्थिति को ठीक से संभालने में विफलता का है। दूसरा आरोप यह है कि कुछ फैसलों के कारण कई मतदाताओं को मतदान के अधिकार से वंचित होना पड़ा। तीसरा आरोप राजनीतिक पक्षपात का है, जिसमें कहा गया है कि चुनाव आयोग का रवैया कुछ दलों के प्रति निष्पक्ष नहीं रहा।
आरोपों को समर्थन
विपक्षी दलों ने अपने आरोपों को मजबूत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का भी हवाला दिया है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग को पूरी तरह निष्पक्ष रहकर काम करना चाहिए और किसी भी फैसले से मतदाताओं के अधिकार प्रभावित नहीं होने चाहिए। इन तर्कों के आधार पर विपक्ष ने महाभियोग की मांग को उचित ठहराने की कोशिश की है।
आगे की प्रक्रिया तय
अब अगले 14 दिनों के भीतर लोकसभा के स्पीकर और राज्यसभा के सभापति को यह तय करना होगा कि इस नोटिस को स्वीकार किया जाए या नहीं। यदि नोटिस स्वीकार कर लिया जाता है तो मामले की जांच के लिए एक समिति बनाई जाएगी, जो आरोपों की जांच करेगी और उसके आधार पर आगे की संसदीय प्रक्रिया शुरू होगी। अगर नोटिस खारिज होता है तो मामला यहीं समाप्त हो सकता है।