
दुनिया के 60 मुस्लिम देशों की बड़ी मीटिंग इस हफ्ते कतर की राजधानी दोहा में हुई। इस बैठक का मुख्य एजेंडा था- इजरायल के हमलों पर चर्चा और मुस्लिम देशों की साझा रणनीति। बैठक में पाकिस्तान और तुर्की ने “इस्लामिक नाटो” बनाने का प्रस्ताव रखा, जो अमेरिका की अगुवाई वाले नाटो की तर्ज पर हो। इसका मकसद था मुस्लिम देशों को सुरक्षा की गारंटी देना। हालांकि इस पर कोई ठोस फैसला नहीं हुआ, लेकिन पाकिस्तान और सऊदी अरब ने बैठक के बाद एक अहम कदम उठाया।
पाकिस्तान-सऊदी अरब का सुरक्षा करार
मीटिंग के तुरंत बाद पाकिस्तान और सऊदी अरब ने सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत किसी एक देश पर हमला, दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। यानी, दोनों देशों ने एक-दूसरे को सुरक्षा गारंटी दी है। यह समझौता भले ही पूरे मुस्लिम जगत का नहीं है, लेकिन इसे इस्लामिक नाटो की ओर पहला कदम माना जा रहा है।
पाकिस्तान लंबे समय से मुस्लिम देशों को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहा है। खासकर कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए वह इस्लामिक एकजुटता चाहता है। इस समझौते से पाकिस्तान को इस्लामिक देशों के बीच अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिलेगा।
भारत के लिए मायने
भारत के लिए यह खबर खास महत्व रखती है, क्योंकि पाकिस्तान उसका चिर प्रतिद्वंद्वी है। मई में ही भारत-पाकिस्तान के बीच 4 दिन तक सीमा पर झड़प चली थी। ऐसे में पाकिस्तान का सऊदी अरब से सुरक्षा करार करना, भारत के नजरिए से नया रणनीतिक समीकरण है। हालांकि दिलचस्प बात यह है कि सऊदी अरब ने इसी बीच भारत के साथ रिश्ते मजबूत करने की बात भी कही। अरब न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, एक सऊदी अधिकारी ने कहा कि “भारत और सऊदी अरब के बीच ऐतिहासिक दोस्ती है। हम क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए रिश्ते और मजबूत करेंगे।”
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परमाणु हथियार पर चुप्पी
इस समझौते में पाकिस्तान के पास मौजूद परमाणु हथियारों का जिक्र नहीं किया गया है। लेकिन सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सुरक्षा सहयोग नया नहीं है। 1967 से ही दोनों देशों के बीच रक्षा करार रहे हैं। पाकिस्तान अब तक 8200 सऊदी सैनिकों को अपने यहां प्रशिक्षण दे चुका है।
इस्लामिक नाटो की ओर शुरुआती कदम
विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में तुर्की, मलेशिया और अन्य मुस्लिम देश भी ऐसे समझौतों में शामिल हो सकते हैं। इजरायल को लेकर मुस्लिम देशों में गुस्सा और साझा कार्रवाई की मांग हमेशा से उठती रही है, लेकिन सभी देशों के बीच एकमत की कमी रही है। इस बार पाकिस्तान और सऊदी अरब ने जो करार किया है, वह भले छोटा हो, लेकिन इसे इस्लामिक नाटो के शुरुआती कदम के तौर पर देखा जा रहा है। यह समझौता मुस्लिम देशों की राजनीति और सुरक्षा समीकरण में नई दिशा दिखाता है। भारत के लिए चुनौती और अवसर दोनों मौजूद हैं, क्योंकि सऊदी अरब पाकिस्तान से नजदीकी बढ़ाने के साथ-साथ भारत से रिश्ते भी संतुलित करना चाहता है।