पाकिस्तान इस समय दोहरी मुश्किल में दिख रहा है। एक तरफ सीमाई तनाव की खबरें हैं, दूसरी ओर गेहूं की पैदावार घटने का खतरा मंडरा रहा है। ताजा आकलन के मुताबिक इस साल गेहूं उत्पादन में करीब 2 से 2.2 मिलियन टन तक कमी आ सकती है। पाकिस्तान की बड़ी आबादी रोटी, नान और ब्रेड जैसे गेहूं से बने खाने पर निर्भर है। ऐसे में उत्पादन घटा तो बाजार में दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है।
आम लोगों पर पड़ सकता है असर
अगर फसल कम हुई तो सप्लाई पर सीधा असर पड़ेगा। इसका मतलब है कि आटे की कीमतें बढ़ सकती हैं। पहले से महंगाई झेल रहे लोगों के लिए यह और मुश्किल पैदा कर सकता है। सरकार को कीमतें काबू में रखने के लिए सब्सिडी या आयात जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं। नहीं तो खाद्य संकट गहराने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
खेती का रकबा भी हुआ कम
इस साल गेहूं की खेती का रकबा भी घटा है। पहले जहां करीब 10.37 मिलियन हेक्टेयर में बुवाई होती थी, वह घटकर लगभग 9.1 मिलियन हेक्टेयर रह गई है। खेती का क्षेत्र कम होने का मतलब है कि कुल उत्पादन भी कम होगा। यह बदलाव आने वाले महीनों में बाजार पर असर डाल सकता है।
ये भी पढ़ें : नकली ट्रैफिक चालान के नाम पर बड़ा साइबर जाल, एक क्लिक में खाली हो सकता है बैंक खाता; ऐसे बचें इस नए फ्रॉड से
सूखा और कम बारिश बड़ी वजह
मौसम भी इस बार किसानों के साथ नहीं रहा। साल की शुरुआत में औसत से लगभग 39 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। जिन इलाकों में सिंचाई की सुविधा सीमित है, वहां फसल को ज्यादा नुकसान हुआ। पानी की कमी और सूखे हालात ने पैदावार पर दबाव बढ़ा दिया है। कम वर्षा का सीधा असर खेतों में दिख रहा है।
अशांति का भी पड़ा असर
बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे इलाकों में अस्थिर हालात ने भी खेती और सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। सुरक्षा समस्याओं के कारण उत्पादन और अनाज की ढुलाई दोनों पर असर पड़ा है। जब अंदरूनी हालात स्थिर नहीं होते, तो कृषि गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं।
दोहरी चुनौती में घिरा देश
कुल मिलाकर पाकिस्तान एक साथ कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। एक तरफ खाद्य संकट की आशंका, दूसरी ओर सुरक्षा और सीमाई तनाव। आने वाले समय में सरकार की नीतियां, आयात की उपलब्धता और मौसम की स्थिति तय करेगी कि हालात संभलेंगे या और बिगड़ेंगे। फिलहाल आम लोगों की नजर रोटी की कीमतों पर टिकी हुई है।