पिछले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। वेस्ट एशिया में युद्ध के दौरान जहां भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत 146 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, वहीं अब यह घटकर 70 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे आ गई है। ऐसे में आम लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कच्चा तेल इतना सस्ता हो गया है तो पेट्रोल और डीजल की कीमतें कब कम होंगी? विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में यही स्थिति बनी रहती है तो जुलाई के आखिर या अगस्त की शुरुआत तक पेट्रोल और डीजल 2 से 4 रुपये प्रति लीटर तक सस्ते हो सकते हैं। हालांकि इसके लिए ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बना युद्धविराम भी कायम रहना जरूरी माना जा रहा है।
निजी कंपनी ने घटाए दाम, सरकारी कंपनियां अभी इंतजार में
राहत की शुरुआत निजी क्षेत्र से हो चुकी है। देश की बड़ी निजी फ्यूल रिटेलर नयारा एनर्जी ने 1 जुलाई से पेट्रोल 5 रुपये और डीजल 3 रुपये प्रति लीटर सस्ता कर दिया है। कंपनी ने युद्ध के दौरान बढ़ाई गई कीमतों को वापस लिया है। हालांकि इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियों ने अभी तक अपने दाम नहीं घटाए हैं। देश के 90 प्रतिशत से ज्यादा पेट्रोल पंप इन्हीं कंपनियों के हैं, इसलिए आम लोगों को वास्तविक राहत तभी मिलेगी जब ये कंपनियां भी कीमतों में कटौती करें। इसी बीच कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर भी 173 से 184 रुपये तक सस्ता हुआ है, लेकिन घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
कच्चा तेल सस्ता होने के बाद भी तुरंत राहत क्यों नहीं मिलती?
विशेषज्ञों के मुताबिक पेट्रोल और डीजल की कीमत सिर्फ कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करती। इसमें रिफाइनिंग का खर्च, परिवहन लागत, डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति, टैक्स और तेल कंपनियों का मार्जिन भी शामिल होता है। इसके अलावा भारत तत्काल बाजार से तेल नहीं खरीदता, बल्कि कई सप्ताह पहले किए गए आयात समझौतों के तहत खरीदा गया महंगा कच्चा तेल पहले रिफाइन किया जाता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिरने के बावजूद खुदरा बाजार में उसका असर दिखने में आमतौर पर दो से चार सप्ताह का समय लग जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा हालात में सरकारी कंपनियां पहले युद्ध के दौरान हुए नुकसान की भरपाई करना चाहेंगी, उसके बाद ही कीमतों में राहत देने का फैसला लिया जा सकता है।
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सरकार और तेल कंपनियों का क्या है गणित?
जब युद्ध के दौरान कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी थीं, तब सरकार और तेल कंपनियों ने पूरा बोझ सीधे ग्राहकों पर नहीं डाला। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में सीमित बढ़ोतरी की गई, जबकि बड़ी लागत खुद सरकार और तेल कंपनियों ने उठाई। सरकार ने एक्साइज ड्यूटी घटाकर राहत दी, जिससे उसके राजस्व पर असर पड़ा। वहीं तेल कंपनियों को भी भारी अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ा। अब जबकि क्रूड ऑयल सस्ता हो गया है, कंपनियां पहले अपने वित्तीय नुकसान की भरपाई करना चाहती हैं। इसी कारण कीमतों में कटौती जल्द होने की संभावना तो है, लेकिन बहुत बड़ी राहत की उम्मीद फिलहाल नहीं की जा रही। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक बाजार स्थिर रहता है तो 2 से 4 रुपये प्रति लीटर तक की कटौती सबसे संभावित विकल्प हो सकती है।
आम लोगों को कब मिल सकती है राहत?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ सप्ताह बेहद अहम होंगे। यदि कच्चे तेल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं या इससे नीचे जाती हैं और वेस्ट एशिया में तनाव दोबारा नहीं बढ़ता, तो जुलाई के अंतिम सप्ताह या अगस्त की शुरुआत में सरकारी तेल कंपनियां भी पेट्रोल और डीजल के दाम घटा सकती हैं। इससे आम लोगों की जेब पर बोझ कम होगा, परिवहन लागत घटेगी और महंगाई को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी। हालांकि अंतिम फैसला वैश्विक बाजार, तेल कंपनियों की लागत और सरकार की कर नीति पर निर्भर करेगा। इसलिए फिलहाल राहत की उम्मीद तो मजबूत है, लेकिन इसके लिए कुछ और समय इंतजार करना पड़ सकता है।